समुद्र-सी डगमगाती जीवन की राह में,
जब दिशा कहीं दिखाई नहीं देती;
लहरों के पार एक रोशनी झिलमिलाती है—
दूर एक प्रकाशस्तंभ पुकारता है।
चारों ओर अँधेरा गहराता जाए,
हवाएँ चाहे कितनी भी तेज़ चलें;
थकी हुई जीवन-नाव के भीतर
बस उम्मीद ही बुझने से इनकार करती है।
मंज़िल भले बहुत दूर दिखाई दे,
वह रोशनी फिर भी राह दिखाती है;
जिस किनारे का भरोसा भी नहीं,
दिल फिर उसी ओर चल पड़ता है।
कुछ रोशनियाँ पाने के लिए नहीं होतीं,
वे बस राह भटकने से बचाती हैं;
जीवन चाहे अँधेरे में डूबा रहे—
जहाँ उम्मीद है, वहीं सवेरा है।
जी आर कवियुर
05 10 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर)
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