होंठों पर एक मुस्कान ठहरी रहती है,
फिर भी आँखों में कुछ बारिशें बाकी हैं;
हँसी के पीछे छिपी खामोशी में
टूटे हुए सपने अब भी सोते हैं।
दुनिया के सामने रोशन खड़े रहकर,
भीतर का अँधेरा कोई देख नहीं पाता;
एक शब्द के इंतज़ार में बैठा दिल
कितनी अनकही बातें निगल जाता है।
समय सिखाई खामोशी की भाषा में
दर्द भी धीरे-धीरे आदत बन जाता है;
बंद पड़ी मुस्कान की चाबी खोजते-खोजते
आख़िर दिल खुद ही दरवाज़े तक पहुँचता है।
फिर उस मुस्कान को मुखौटे की ज़रूरत नहीं,
आँसुओं को भी छिपने का बहाना नहीं;
खुद को पहचान लेने का एक पल ही काफी है—
भूली हुई मुस्कान फिर से खिल उठने के लिए।
जी आर कवियुर
05 10 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर)
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