Tuesday, October 6, 2026

बंद मुस्कान

बंद मुस्कान

होंठों पर एक मुस्कान ठहरी रहती है,
फिर भी आँखों में कुछ बारिशें बाकी हैं;
हँसी के पीछे छिपी खामोशी में
टूटे हुए सपने अब भी सोते हैं।

दुनिया के सामने रोशन खड़े रहकर,
भीतर का अँधेरा कोई देख नहीं पाता;
एक शब्द के इंतज़ार में बैठा दिल
कितनी अनकही बातें निगल जाता है।

समय सिखाई खामोशी की भाषा में
दर्द भी धीरे-धीरे आदत बन जाता है;
बंद पड़ी मुस्कान की चाबी खोजते-खोजते
आख़िर दिल खुद ही दरवाज़े तक पहुँचता है।

फिर उस मुस्कान को मुखौटे की ज़रूरत नहीं,
आँसुओं को भी छिपने का बहाना नहीं;
खुद को पहचान लेने का एक पल ही काफी है—
भूली हुई मुस्कान फिर से खिल उठने के लिए।


जी आर कवियुर 
05 10 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर)

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