Wednesday, October 14, 2026

ख़ामोशियों के दरमियाँ(पारंपरिक हिंदुस्तानी ग़ज़ल)

ख़ामोशियों के दरमियाँ
(पारंपरिक हिंदुस्तानी ग़ज़ल)
कभी ख़ामोश रहकर भी बहुत कुछ कह गए हम,
दिल में छुपे हुए दर्द को सह गए हम।

जिन्हें अपना समझकर दिल में जगह दी थी,
उनकी ख़ातिर हर सितम चुपचाप सह गए हम।

वफ़ा की राह में अपना सब कुछ लुटाकर,
आँखों में अश्क लेकर भी बह गए हम।

वो समझ न सके दिल की सच्ची कहानी,
अपने ही दर्द को ख़ामोशी से कह गए हम।

जिनकी ख़ुशी के लिए हर दर्द सहते रहे,
उनकी बेरुख़ी के साए में रह गए हम।

उम्मीद थी कि वो एक दिन समझेंगे हमें,
उम्मीद के सहारे ही उम्र भर रह गए हम।

जी. आर. के दिल की कहानी कौन समझे,
ग़ज़लों में अपने दर्द को कह गए हम।

 ज़ी आर कवियुर 
13 10 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)

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