बड़ी-बड़ी राहों पर चलकर
मैं दूर बहुत निकल गया,
एक छोटी-सी पगडंडी ही
मुझे अपने भीतर ले गई।
चमकती दुनिया के बीच
बहुत कुछ सच-सा लगा,
आईने के सामने खड़ा हुआ तो
चेहरा ही एकमात्र साक्षी था।
दूसरों की तालियों के लिए
मैंने कई चेहरे ओढ़े,
अकेलेपन की उस घड़ी में
सारे मुखौटे उतर गए।
बिना पदचिह्नों वाली राह पर
एक उजली किरण सामने थी,
उसकी रोशनी का अनुसरण किया तो
मैं अपने ही भीतर पहुँच गया।
तब जाकर समझ पाया—
यात्रा दूरी घटाने का नाम नहीं,
अहंकार से सत्य की ओर
मुड़ता हुआ एक कदम ही
सबसे छोटी राह है।
जी आर कवियुर
30 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर
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