Thursday, October 1, 2026

मनुष्य के भीतर का यात्री

मनुष्य के भीतर का यात्री

दूरियाँ तलाशते हुए जो समय बीता,
वह पैरों की धूल बनकर रह गया;
अनजाने शहरों से गुज़रता रहा,
फिर भी स्वयं से अनजान ही रहा।

एक अनदेखे द्वार की खोज में
भीतर कोई चलता रहा,
खामोशी की सँकरी गलियों में
पुराने सवाल जाग उठे।

आईने में दिखते चेहरे के पीछे
एक और चेहरा छिपा था,
दुनिया से अनसुनी आवाज़ में
वह मुझसे कुछ कहता रहा।

जब बाहर जाती सारी राहें थम गईं,
भीतर जाने की राह चमक उठी;
वहाँ पहुँचने के उस पल में
मेरे भीतर का यात्री मुस्कुरा उठा।

तब जाकर समझ में आया—
दुनिया घूम लेने से भी आगे
मनुष्य की सबसे लंबी यात्रा
स्वयं को खोज लेने का एक कदम है।

जी आर कवियुर 
30 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

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