ऊँचाइयों की ओर बढ़ते हुए एक दिन,
एक कदम फिसला और नीचे आ गिरा;
टूटे सपने नहीं थे उस पल—
अपने बारे में कुछ भ्रम टूटे थे।
राह किनारे जब अकेला पड़ा था,
साथ चलने वाले कई लोग दूर हो गए;
उस खामोशी में, जहाँ कोई हाथ नहीं था,
अपने ही हाथों की ताकत पहचान ली।
गिरने ने दर्द दिया, मगर सिखाया—
ऊँचाई ही जीवन का पैमाना नहीं;
गिरी हुई मिट्टी में भी बीज उगते हैं,
और वहीं से जंगल जन्म लेते हैं।
अब गिरने से डरने की ज़रूरत नहीं,
जब हर टूटन एक सबक बन जाए;
जहाँ गिरा था, वह हार की निशानी नहीं—
वहीं से उठने का प्रमाण है।
जी आर कवियुर
05 10 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर)
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