Tuesday, April 21, 2026

॥ माँ गंगा के चरणों में ॥


॥ माँ गंगा के चरणों में ॥

शिव की जटा से निकली धारा, पावन रूप तुम्हारा है,
पतित-पावनी हे माँ गंगे, तू ही जग का सहारा है।
वैशाख शुक्ल की सप्तमी को, धरा पर जो तुम आई हो,
अमृतमयी शीतल जल से, खुशियाँ साथ तुम लाई हो।

जह्नु ऋषि की तुम पुत्री हो, 'जाह्नवी' नाम तुम्हारा है,
पाप मिटाती हर प्राणी का, निर्मल प्रवाह तुम्हारा है।
पुण्य उदय होते हैं माँ, तेरे पावन एक दर्शन से,
जीवन सफल हो जाता है, श्रद्धापूर्ण आचमन से।

दीप दान की अनुपम शोभा, तट पर छटा निराली है,
आरती की पावन ध्वनि से, मन में छाई लाली है।
जन-जन की तुम तारिणी माता, नमन तुम्हें शत-बार करें,
भक्ति तुम्हारी हृदय में भरके, हम भवसागर पार करें।

जी आर कवियुर 
22 04 2026
तिरुवल्ला कवियुर

Sunday, April 19, 2026

नैनों की प्यास(एक ग़ज़ल)

नैनों की प्यास
(एक ग़ज़ल)

ये नैना काजल बिना तरसें,
तेरी दीद की आस में तरसें।

तेरे ख़्वाब दिल के क़रीब आएँ,
मगर छूने की प्यास में तरसें।

तेरी याद की चाँदनी उतरे,
हम अंधेरी हर रात में तरसें।

लबों पे तेरा ही नाम आए,
मगर कहने की बात में तरसें।

तू पास होकर भी दूर जैसे,
हम तेरे ही एहसास में तरसें।

ये दिल तेरे इश्क़ में डूबा,
किसी और जज़्बात में तरसें।

नज़रें बिछाए बैठे हैं हम,
तेरे आने की राह में तरसें।

'जी आर' भी अब यही कहे है,
तेरी एक मुलाक़ात में तरसें।

 जी आर कवियुर 
20 04 2026 

झील किनारे की निस्तब्धता

झील किनारे की निस्तब्धता


झील किनारे शांति फैलती,  
जल दर्पण सा स्थिर दिखता।  
जब हवा हल्के से छू जाती,  
लहरें धीरे-धीरे चलतीं।  

दूर कहीं नाव की परछाईं,  
खामोशी में कथा लिखती।  
पत्तों की शांत सी हलचल में,  
प्रकृति सुकून देती है।  

आकाश जल में झलक दिखाए,  
दो दुनिया एक हो जातीं।  
इन शांत पलों के भीतर,  
दिल को सुकून मिल जाता।

जी आर कवियुर 
19 04 2026
(तिरुवल्ला ,कवियुर )

संध्या के बादल

संध्या के बादल

संध्या में बादल रंग बदलते,  
आकाश चित्र सा बन जाता।  
लाल और सुनहरे रंग मिलकर,  
एक सुंदर दृश्य रच जाते।  

धीरे-धीरे चलती आकृतियां,  
सपनों जैसी लगती हैं।  
सूर्य के विदा होते क्षण में,  
रोशनी छाया में खो जाती।  

इन बादलों की यात्रा में,  
समय शांत बहता जाता।  
इस संध्या की सुंदरता में,  
हृदय को शांति मिल जाती।

जी आर कवियुर 
19 04 2026
(तिरुवल्ला ,कवियुर )

बारिशी हवा की लय

बारिशी हवा की लय

बरसाती हवा की लय में,  
पत्ते धीरे-धीरे हिलते।  
जब बूंदें साथ मिलतीं,  
एक मधुर धुन बनती।  

ठंडी छुअन गुजरती जाए,  
मन शांति में बहता है।  
भीगी राहें चमक उठतीं,  
रोशनी चारों ओर नाचे।  

जब दोनों का संगम होता,  
प्रकृति गीत बन जाती।  
इस मधुर लय के भीतर,  
जीवन खिल उठता है।

जी आर कवियुर 
19 04 2026
(तिरुवल्ला ,कवियुर )

तारों की गलियां


तारों की गलियां

आकाश की राहों में तारे चमकते,  
रात अपनी सुंदरता दिखाती।  
छोटी-छोटी रोशनियां मिलकर,  
अनंत कथा सुनाती जातीं।  

इस खामोश आकाश में,  
मन दूर तक चला जाता।  
हर चमक एक सपना बनकर,  
जीवन को भर देता।  

गलियों जैसे फैले तारे,  
एक अद्भुत संसार रचते।  
जब आंखें उन्हें निहारतीं,  
दिल में खुशी भर जाती।

जी आर कवियुर 
19 04 2026
(तिरुवल्ला ,कवियुर )

पक्षियों का गीत

पक्षियों का गीत

जब सुबह पक्षी गाते,  
दुनिया नई जाग उठती।  
पंख फैलाकर उड़ते क्षण में,  
स्वतंत्रता गीत बन जाती।  

पेड़ों की शाखों से,  
मधुर स्वर बहते आते।  
हवा के संग मिलकर,  
दिल को छू जाते हैं।  

इन छोटे जीवों का गान,  
बड़ी खुशी दे जाता।  
प्रकृति के इस संगीत में,  
जीवन उजाला पाता।

जी आर कवियुर 
19 04 2026
(तिरुवल्ला ,कवियुर )

आंखों की दास्तान (ग़ज़ल)

आंखों की दास्तान (ग़ज़ल)

आंखों में नमी, दिल में प्यार है  
आहों की ये दास्तान भी प्यार है  

तन्हाइयों का सिलसिला बरक़रार है  
हर एक ख़्वाब अब भी तेरा इंतज़ार है  

दिल की सदा में छुपा इकरार है  
खामोश लफ़्ज़ों में भी असरदार है  

रातों की चादर में तेरा ही ख़ुमार है  
चांदनी भी जैसे तेरा किरदार है  

यादों का हर लम्हा दिल पे सवार है  
बीता हुआ हर पल भी क़रार है  

रूह में बसा तेरा ही निखार है  
मेरे हर जज़्बात पे तेरा अधिकार है  

‘जी आर’ के लफ़्ज़ों में बस तेरा ही प्यार है  
इस दिल की हर धड़कन तेरा ही इकरार है

जी आर कवियुर 
16 04 2026
(तिरुवल्ला,कवियुर)

बारिश के मोती

बारिश के मोती

जब बूंदें मोती बनकर गिरतीं,  
धरती खुशी से मुस्काती।  
पत्तों पर ठहरकर चमकतीं,  
आंखों को ठंडक देतीं।  

हर छोटी सी गिरती बूंद,  
जीवन में नई ताजगी लाए।  
भीगी राहें चमक उठतीं,  
रोशनी पानी में खेले।  

इन बारिश के मोतियों में,  
खुशी छुपी रहती है।  
प्रकृति के इस खेल में,  
मन आनंद पा लेता है।  

जी आर कवियुर 
13 04 2026



फूलों का राग

फूलों का राग

फूलों से भरे बगीचे में,  
रंग मिलकर गीत बनाते।  
जब खुशबू चारों ओर फैले,  
मन संगीत सुन पाता।  

पंख वाले जीव उड़ते फिरें,  
खुशी हर ओर बिखेरते।  
जब पंखुड़ियां खुलतीं धीरे,  
जीवन नया सा लगता।  

प्रकृति का यह मधुर राग,  
दिल की धड़कन से मिलता।  
फूलों की इस दुनिया में,  
सुंदरता बसती रहती।  

जी आर कवियुर 
13 04 2026

 

चांदनी के दृश्य

चांदनी के दृश्य

जब चांदनी धीरे उतरती,  
दुनिया चांदी सी चमकती।  
राहों पर उजाला फैलता,  
परछाइयां लंबी चलतीं।  

रात की खामोशी में,  
मन सपनों में खो जाता।  
आकाश में चमकता चांद,  
आशा का दीप बन जाता।  

इन चांदनी के दृश्यों में,  
शांति भरी दुनिया दिखती।  
मन की गहराइयों में भी,  
रोशनी जगमग करती।  

जी आर कवियुर 
13 04 2026

चंपा फूल की सुंदरता**

चंपा फूल की सुंदरता**

चंपा का कोमल सा मुस्कान,  
आंखों में सुंदरता भर दे।  
जब उसकी खुशबू फैलती,  
मन में खुशी खिल जाती।  

उसका सुनहरा रंग दमके,  
जैसे प्रकृति सजी हो सुंदर।  
मधुमक्खियां चारों ओर नाचें,  
जीवन गीत बन जाता।  

छोटे से इस फूल की उपस्थिति,  
बड़ी सुंदरता दे जाती।  
चंपा की इस मोहकता में,  
दिल मिठास से भर जाता।  

जी आर कवियुर 
13 04 2026



मधु की मिठास


मधु की मिठास

फूलों से निकला एक रस,  
मधुमक्खियां उसे संजोतीं।  
मौन परिश्रम का यह फल,  
स्वाद में खुशी भर देता।  

प्रकृति का यह सुंदर उपहार,  
कोमल और मधुर रस।  
छोटी सी बूंद में भी,  
मिठास का संसार छिपा।  

जीवन की खुशियों जैसा,  
धीरे-धीरे मन में घुले।  
इस सरल मधु के भीतर,  
प्रेम की ध्वनि सुनाई दे।

जी आर कवियुर 
13 04 2026

मिट्टी की खुशबू


मिट्टी की खुशबू

जब बूंदें धरती को छूतीं,  
नमी की खुशबू उठती है।  
जैसे नया जीवन जन्म ले,  
प्रकृति आनंद बिखेरती है।  

खेतों में हरियाली छा जाए,  
आंखों को ठंडक देती है।  
हवा में फैली यह सुगंध,  
दिल को स्नेह से भर देती।  

यादों को फिर से जगा देती,  
बीता समय लौटा लाती।  
धरती का यह सुंदर उपहार,  
जीवन में शांति भर देता।

जी आर कवियुर 
13 04 2026

नदी की निस्तब्धता


नदी की निस्तब्धता

बहती नदी शांत सी लगती,  
भीतर कोई कथा चलती।  
किनारे उसकी बात समझते,  
बिन शब्दों के सुन लेते।  

पत्थरों के बीच राह बनाकर,  
आगे बढ़ती रहती है।  
गहराई में छिपी एक ध्वनि,  
दिल ही उसे सुन पाता।  

नदी की यह मौन यात्रा,  
जीवन को राह दिखाती।  
जैसे शांति की शक्ति होती,  
मन सुकून को खोजता।

जी आर कवियुर 
13 04 2026

रूठ गई (ग़ज़ल)

रूठ गई (ग़ज़ल)

आँखें चार हुईं, जब जवानी रूठ गई  
हाय उस बुढ़ापे के चाँद जो खिले, रूठ गई

सपनों के बाग़ में भी अब खुशबू रूठ गई  
फूलों की महक कहीं हवाओं में रूठ गई

हँसी थी जो चेहरे पर, वो झील सी रूठ गई  
दिल के अंदर की चमक अब नींदों में रूठ गई

यादों की गलियों में कदम मेरे थक गए  
अधूरी दास्तां सब ग़ज़लों में रूठ गई

मुसाफिर थे जो साथ चले, वो राहों में रूठ गए  
कदमों की आवाज़ भी अब हवाओं में रूठ गई

आँसू जो बहते थे रात की तनहाई में  
उनकी भी नमी अब तक़दीर में रूठ गई

वक़्त की धार ने तोड़ी रिश्तों की डोर  
सपनों के मेले की भी रौनक रूठ गई

इश्क़ की खुशबू अब तक़दीर की किताब में  
ग़ज़लों की गली में अकेली रूठ गई

मैं जी आर, कहूँ तुम्हें दिल की बात यही  
हमारी हसरतों की हर खुशबू रूठ गई

जी आर कवियुर 
06 04 2026
(कनाडा, टोरंटो)

अजब सफ़र, सच्चा मोह (ग़ज़ल)

अजब सफ़र, सच्चा मोह (ग़ज़ल)

इस जीवन के तराने में अजब सा मेल हो गया,
तेरी गलियों में भटकता दिल तुझी से मोह हो गया।

कभी सोचा न था ये रास्ता बदल जाएगा,
चलते-चलते देखो मन भी जैसे खो गया।

तू दूर रहकर भी हर पल पास लगता है,
आँखों से ओझल सही, दिल में तू ही हो गया।

समय की धूप में जलते रहे सपने कितने,
तेरी यादों का साया मन को ठंडा कर गया।

पराए देश में कुछ कमी सी हरदम लगी,
तेरी मिट्टी की खुशबू से ही मन पूरा हो गया।

ये आठ महीने जैसे एक लंबी परीक्षा थे,
घर लौटने का सोचते ही मन उजला हो गया।

अब लौटकर आऊँगा अपने उसी आंगन में,
जहाँ हर दुख भी अपनों में हल्का हो गया।

कहता हूँ मैं “जी आर” ये सफर भी अजब कहानी है,
दूर रहकर ही दिल को तुझसे सच्चा मोह हो गया।


जी आर कवियुर 
06 04 2026
(कनाडा, टोरंटो) 

Raga Puriya Dhanashree

Fusion Gazhal 
अजब सफ़र, सच्चा मोह (ग़ज़ल)
വേറിട്ട യാത്ര, സത്യമായ മോഹങ്ങൾ ( ഗസൽ)

इस जीवन के तराने में अजब सा मेल हो गया,
तेरी गलियों में भटकता दिल तुझी से मोह हो गया।

ഈ ജീവിത തരംഗങ്ങളിലെ അസാധാരണമാം മോഹങ്ങൾ,
നിന്റെ വീഥികളിൽ തിരഞ്ഞു ഹൃദയം ആ സത്യപ്രണയത്തിന് മോഹങ്ങൾ

तू दूर रहकर भी हर पल पास लगता है,
आँखों से ओझल सही, दिल में तू ही हो गया।

അകലെ ആയിട്ടും നീ എല്ലായ്പ്പോഴും നിൻ സാമീപ്യം തോന്നുന്നു,
മിഴികളിൽ കാണാനില്ലെങ്കിലും മൊഴികളിൽ നീ മാത്രം ഹൃദയ മോഹങ്ങൾ.

समय की धूप में जलते रहे सपने कितने,
तेरी यादों का साया मन को ठंडा कर गया।

കാലത്തിന്റെ ചൂടിൽ പല സ്വപ്നങ്ങളും കരഞ്ഞു പോയി,
നിന്റെ ഓർമ്മകളുടെ നിഴൽ മനസ്സിനെ ശാന്തമാക്കി ഹൃദയ മോഹങ്ങൾ.

पराए देश में कुछ कमी सी हरदम लगी,
तेरी मिट्टी की खुशबू से ही मन पूरा हो गया।

ഏഴു കടലിനുമിപ്പുറത്ത് ആയിരുന്നാലും ചിലത് അപൂർണ്ണമായി തോന്നിയേക്കാം,
നിന്റെ മണ്ണിന്റെ സുഗന്ധം മനസ്സിൽ നിറയുന്നു ഹൃദയ മോഹങ്ങൾ.

अब लौटकर आऊँगा अपने उसी आंगन में,
जहाँ हर दुख भी अपनों में हल्का हो गया।

ഇനി തിരികെ വന്നീടും അതേ അങ്കണത്തിൽ
അവിടെ എത്തുമ്പോൾ വിഷമങ്ങൾ
കുറയുമല്ലോ ഹൃദയ മോഹങ്ങൾ

कहता हूँ मैं “जी आर” ये सफर भी अजब कहानी है,
दूर रहकर ही दिल को तुझसे सच्चा मोह हो गया।

ജീ ആർ എന്ന എൻ്റെ യാത്ര ഇപ്പോഴും
കഥയായി തുടരുന്നു
ദൂരെ എങ്കിലും നിറയുന്നു ഹൃദയത്തിൽ നിനക്കായുള്ള മോഹങ്ങൾ


जी आर कवियुर / ജീ ആർ കവിയൂർ 
06 04 2026
(कनाडा, टोरंटो) / (കാനഡ, ടൊറൻ്റോ) 

अजब सफ़र, सच्चा मोह (ग़ज़ल)

अजब सफ़र, सच्चा मोह (ग़ज़ल)

इस जीवन के तराने में अजब सा मेल हो गया,
तेरी गलियों में भटकता दिल तुझी से मोह हो गया।

कभी सोचा न था ये रास्ता बदल जाएगा,
चलते-चलते देखो मन भी जैसे खो गया।

तू दूर रहकर भी हर पल पास लगता है,
आँखों से ओझल सही, दिल में तू ही हो गया।

समय की धूप में जलते रहे सपने कितने,
तेरी यादों का साया मन को ठंडा कर गया।

पराए देश में कुछ कमी सी हरदम लगी,
तेरी मिट्टी की खुशबू से ही मन पूरा हो गया।

ये आठ महीने जैसे एक लंबी परीक्षा थे,
घर लौटने का सोचते ही मन उजला हो गया।

अब लौटकर आऊँगा अपने उसी आंगन में,
जहाँ हर दुख भी अपनों में हल्का हो गया।

कहता हूँ मैं “जी आर” ये सफर भी अजब कहानी है,
दूर रहकर ही दिल को तुझसे सच्चा मोह हो गया।


जी आर कवियुर 
06 04 2026
(कनाडा, टोरंटो) 

पत्थरों की भी कहानियाँ

पत्थरों की भी कहानियाँ

पत्थरों के पास भी कहने को बातें हैं,
मौन में छुपी अनगिनत यादें हैं।
समय के कदमों ने छुआ जिन राहों को,
उनमें बसतीं गवाही की छायें हैं।

बारिश ने छूकर यादें जगाईं,
धूप ने कठोर लम्हे बनाए।
बिना शब्दों के सच कह जाते,
मौन में अपनी भाषा सुनाते।

रास्तों के किनारे पड़े ये रूप,
यात्राओं के राज़ संभाले हुए।
अनदेखी आँखें भी समझ जाएं,
ये जीवन को चुपचाप लिखे हुए।

जी आर कवियुर 
30 03 2026
 (कनाडा, टोरंटो)

करार है (ग़ज़ल)

करार है (ग़ज़ल)


दिल को भी ज़ुबाँ मिली — बीती यादों का करार है,
लम्हों में सदियों का सफ़र, आज भी करार है।

तेरी ख़ामोश नज़र में छुपा कैसा इकरार है,
बिन कहे जो दिल समझे, वही सच्चा करार है।

रात भर जागती आँखों को तेरा इंतज़ार है,
चाँदनी भी थम गई — जैसे उसको करार है।

तेरी बातों में अजीब सा कोई ऐतबार है,
झूठ भी सच लगे दिल को — ये कैसा करार है।

तेरी यादों का नशा दिल पे ऐसा ख़ुमार है,
होश में रह के भी जैसे कोई बेकरार है।

ज़िंदगी के हर मोड़ पे तेरा ही शिकार है,
दिल ये मासूम सा फिर भी उसी पे करार है।

दर्द को मुस्कुरा के हमने यूँ ही गुज़ार है,
हर खुशी के पीछे जैसे छुपा सा करार है।

'जी आर' हमने दर्द को लफ़्ज़ों में ढाल कर कह दिया,
जो भी सुन ले एक दफ़ा — उम्र भर करार है।


 जी आर कवियुर 
26 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)


दो देशों का संगम


 दो देशों का संगम 

कनाडा की बर्फ और मेपल की लाली,
सीएन टावर की वो ऊँचाई निराली।
पिज़्ज़ा का स्वाद और झील का किनारा,
यादों में बस गया है ये शहर हमारा।

नारियल के पेड़ और बहती नदियाँ,
डोसा-सांभर की महकती गलियाँ।
केरल की हरियाली में अब हम आए,
दोनों पोतों को गले से लगाए।

दो देशों का मेल, एक प्यारा संगम,
खुशियों की गूँज और दूर हुए गम।
प्यार का धागा सबको जोड़ता है,
नया कल मुस्कुराहटें बटोरता है।

जी आर कवियुर 
26 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)

बुझ जाएं। (ग़ज़ल)

बुझ जाएं। (ग़ज़ल)

समा और क्षमा भी बुझ जाएं,
रोशनी के रंगत में अंधकार बुझ जाएं।

सन्नाटा भी गूँज उठे,
चाँदनी में सब यादें बुझ जाएं।

दिल की राहों में चुप्प रहे,
अहसासों की हर कदर बुझ जाएं।

ख्वाबों के पंख भी टूट जाएं,
हसरतों की गलियों में सब बुझ जाएं।

ग़म की बारिश थम जाए,
आँसुओं की नदियाँ भी बुझ जाएं।

मौन की किताबें खुल जाएं,
क़िस्सों की हर पंक्ति बुझ जाएं।

राह-ए-मोहब्बत में छाँव ढल जाए,
सच्चाई की छवि में भ्रम बुझ जाए।

रात की चादर जब ढक जाए,
सपनों की दुनिया में भी सब बुझ जाएं।

जी आर की कलम से ये अल्फ़ाज़ बुझ जाएं,
हर दिल की गूँज में सिर्फ प्यार बुझ जाएं।

जी आर कवियूर 
25-03-2026
(कनाडा, टोरंटो)

Sunday, April 5, 2026

संध्यास्तारक

संध्यास्तारक

संध्याकाल का आकाश नीले रंग में निहारता है,
सितारे यादों में पलट कर झांकते हैं।
पंछी लौटते हैं अपने आशियाने की ओर,
हवा ठंडक की सुगंध फैलाती है चारों ओर।

रास्ते धीरे-धीरे मंद प्रकाश में चमकते हैं,
अनजाने दिल दृश्य की तलाश में रहते हैं।
पगडंडियों पर गिरी आँखों में,
सवेरे की परछाई चमकती है।

सूरज की गर्म यादें,
संध्या के मधुर स्पर्श में विलीन होती हैं।
मौन की धुन में एक स्वर उठता है,
हृदय तक पहुँचती है उम्मीद की रोशनी।

जी आर कवियुर 
30 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)

Friday, April 3, 2026

आशा की किरण

आशा की किरण

जहाँ अंधकार ने सब घेरा,
एक किरण ने आँखें रोशन किया।
आशा के मृदु स्पर्श में,
हृदय का भय धीरे-धीरे पिघल गया।

उभरते सूरज की किरणें फैलती हैं,
धरती और बारिश मिलकर प्रतिबिंब बनाती हैं।
स्मृतियाँ फिर से जीवित होती हैं,
समय की चादर में छुपा प्यार लौटता है।

जो खो गया, उससे पाठ सीखा गया,
आँखों में बड़े सपने चमकते हैं।
एक निश्चय जो कभी नहीं मिटता,
जीवन की अनंत यात्रा बुलाती है।


जी आर कवियुर 
03 04 2026
(कनाडा, टोरंटो)


रात्रि का संगीत

रात्रि का संगीत

मौन से ढकी हुई वन में एक स्वर,
चाँद को मन में रोशन करता संगीत।
हल्की हवा में हृदय की धड़कन,
सितारों की छाया में लय बुनती।

गिरी हुई ओस की बूँदों में प्रतिबिंब,
रात की मधुर धुन में छुपा हुआ।
यादों के पंखों पर उड़ती मौन लय,
प्रकृति का संगीत हृदय को बुलाता।

रात्रि के जादू में विचार बहते,
प्रेम, दर्द, आशा का गान फैलते।
मौन में भी संगीत फैलता,
आसमान और हृदय दोनों को एक साथ बुलाता।

जी आर कवियुर 
03 04 2026
(कनाडा, टोरंटो)

हृदय की धड़कन

हृदय की धड़कन

मौन के बीच गूंजता एक तान,
जीवन की पहचान बनता हर क्षण।
अनजाने ही हर पल में,
अंदर की दुनिया दिखलाता मन।

खुशी के पंखों पर उड़ता स्वर,
दर्द की छाया में धीमा पड़ता।
हर धड़कन में भावनाएँ भरतीं,
अनंत बहतीं, रुकती न रहतीं।

प्रेम के स्पर्श से तेज़ हो जाए,
यादों में बसकर जीवित रह जाए।
यह नाद जो कभी न थमता,
जीवन का सत्य सदा कहता।


जी आर कवियुर 
03 04 2026
(कनाडा, टोरंटो)




वृक्ष की पीड़ा

वृक्ष की पीड़ा

धरती के सीने पर खड़ा एक जीवन,
जड़ों में छुपी अनगिनत स्मृतियाँ।
हवा के स्पर्श से काँपते पत्ते,
बिन कहे ही दर्द बयां करते।

धूप में थकी हुई शाखाएँ,
बारिश में सुकून तलाशती हैं।
समय के स्पर्श से बने पल,
मौन में कहीं बस जाते हैं।

तन में छुपे घाव गहरे,
जीवन का भार सहते रहते।
सब कुछ देकर कुछ न माँगे,
छाया बनकर जग को ढाँपे।

जी आर कवियुर 
03 04 2026
(कनाडा, टोरंटो)

छायादार वृक्ष

छायादार वृक्ष

धूप भरे रास्तों पर छाया फैलती जाए,
डालियों में शांति धीरे-धीरे मुस्काए।
थके हुए मन को सुकून मिल जाता है,
छाया का मार्ग सपनों को सहलाता है।

पत्तों की हलचल कहानी सुनाए,
हवा का संगीत चारों ओर छाए।
जड़ों में सोई बीते समय की यादें,
शाखों में बनकर मुस्कान जगमगाए।

पंछियों का गीत सवेरा बुलाए,
मौन में भी जीवन झलक दिखाए।
छाया देने वाले ये वृक्ष सिखाते,
देने में ही सच्ची खुशी मिल जाती।

 जी आर कवियुर 
30 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)

दिल में ठहरी बात ( ग़ज़ल)

दिल में ठहरी बात ( ग़ज़ल)




बात जब दिल में ही रखी गई,
कहने की चाह में तड़पती रह गई।

तेरी यादों का नूर जब दिल पे उतरा,
हर दुआ उसी में सिमटती रह गई।

रूह ने तुझको ही अपना ख़ुदा समझा,
जिस्म की हर ख्वाहिश भटकती रह गई।

इश्क़ की राह में खुद को मिटाते-मिटाते,
मैं से “हम” की सूरत निखरती रह गई।

तेरी ख़ामोशी में भी एक सदा थी ऐसी,
जो मेरी रग-रग में उतरती रह गई।

दर पे तेरे जो झुकी मेरी ये पेशानी,
हर दुआ वहीं पर ठहरती रह गई।

मैं ‘जी आर’ तेरे दर पे ख़ामोश खड़ा ही रहा,
जो बात थी लबों पर, दिल में ही ठहरती रह गई।

जी आर कवियुर 
02 04 2026
(कनाडा , टोरंटो)

स्वर्ग और नरक यहीं है (ग़ज़ल)

स्वर्ग और नरक यहीं है
 (ग़ज़ल)



सजन रे समझो कि स्वर्ग और नरक यहीं है,
सजन रे समझो कि स्वर्ग और नरक यहीं है।

स्नेह से व्यवहार करो, स्वर्ग सजा लो यहीं है,
कटु वचन बोलो अगर, नरक बना लो यहीं है।

महल चौबारे, धन-दौलत सब यहीं रह जाएंगे,
खुदा ने जो जीवन दिया, उसका हिसाब यहीं है।

भला करोगे तो भला ही लौट कर आएगा,
बुरा करोगे तो बुराई का जवाब यहीं है।

किस्से ये पुराने हैं, दुनिया कहती आई,
लड़केपन से बुढ़ापे तक हर ख्वाब यहीं है।

सच की राह पे चलो, वही रौशनी दिखाएगी,
झूठ के अंधेरों में हर इक नक़ाब यहीं है।

हर एक रूह में वही एक नूर समाया है,
अलग दिखते हैं मगर सबका जनाब यहीं है।

यक़ीं रखो तो दिल से दिल का रास्ता बनता है,
एक-एक में खुदा है, सबका हिसाब यहीं है।

प्रेम सच्चा हो तो वक्त भी झुक जाता है,
ये प्रेम नश्वर नहीं, इसका उजास यहीं है।

“जी आर” ये महसूस कर कहता है दिल से आज,
इंसान के कर्मों में ही स्वर्ग और नरक यहीं है।

जी आर कवियुर 
31 03 2026
(कनाडा , टोरंटो)

सफ़र (ग़ज़ल)

 सफ़र (ग़ज़ल)




ये ज़िन्दगी भी क्या है, बस एक लम्बा सफ़र,
कहीं रुकता नहीं है, ये यादों का सफ़र।

कभी धूप मिली तेज़, कभी ठंडी छाँव मिली,
हर मोड़ पर नया है, ये अपनों का सफ़र।

सफेद बालों ने लिख दी है कहानी अपनी,
चेहरे पर दिखता है, उम्र भर का सफ़र।

पुरानी यादों की गठरी है साथ मेरे,
आँखों में बसता है, ख़्वाबों का सफ़र।

थक कर भी जो कभी रुकता नहीं है,
वही जानता है, इस रूह का सफ़र।

बाल सफेद हो गए, चेहरे पर रेखाएँ आईं,
बताती हैं ये सब, तजुर्बों का सफ़र।

‘जी आर’ लिखता रहा, दिल की हर बात को,
शायरी में ही छुपा है, मेरी रूह का सफ़र।

जी आर कवियूर
01 04 2026
 (कनाडा , टोरंटो)


यादों का सफ़र। ( ग़ज़ल )

 यादों का सफ़र।
  ( ग़ज़ल )




तेरे इनकार से नहीं रुकता दिल का सफ़र,  
मेरी मुरादों में चलता है तेरी यादों का सफ़र।  

तेरी ख़ामोशी में छुपा है कोई दर्द-ए-असर,  
यूँ ही चलता रहा खामोशियों का सफ़र।  

रात भर चाँद भी करता रहा मेरा हमसफ़र,  
तेरी यादों में ही कटता रहा हर एक सफ़र।  

दिल के वीराने में गूँजती रही तेरी ही नज़र,  
किस तरह तय हुआ तन्हाइयों का सफ़र।  

तेरे वादों की छाँव आज भी देती है असर,  
वरना मुश्किल था यूँ जी लेना ये सफ़र।  

हर दुआ में तेरा नाम ही आया बनकर असर,  
मेरी रूह ने भी चुना बस तेरा ही सफ़र।  

कभी ठहर कर भी देखा नहीं इस दिल ने मगर,  
बस चलता ही रहा चाहतों का ये सफ़र।  

तेरी राहों में बिछा दी हैं उम्मीदों की डगर,  
मेरी धड़कनों ने चुना तेरा ही सफ़र।  

‘जी आर’ लिखता रहा दर्द को बनाकर हमसफ़र,  
उसकी ग़ज़लों में ही बसता है दिल का सफ़र।

जी आर कवियुर 
01 04 2026
(कनाडा , टोरंटो)

ज्ञान की ज्योति (​भक्ति गज़ल)

 ज्ञान की ज्योति 

(​भक्ति गज़ल)




​हे माँ सरस्वती, वीणा वादिनी, ज्ञान की ज्योति जगा दो,

मेरे शब्दों में सत्य और प्रेम का मधुर स्वर सजा दो।


​अंधेरों से घिरा है मन का कोना, भटक रहा हूँ राहों में,

मिटा के अज्ञान का ये कुहासा, सुगम रास्ता दिखा दो।


​जगत की चकाचौंध में न खो जाए कहीं सादगी मेरी,

मेरे अंतर्मन में तू अपनी भक्ति की मूरत बसा दो।


​कोई राग ऐसा छेड़ो जो रूह को सुकून दे जाए माँ,

सुरों के संगम से आज मेरा वीरान गुलशन खिला दो।


​नहीं मांगता मैं स्वर्ण-मुकुट या वैभव की ये दुनिया,

बस अपनी करुणा का एक कतरा मेरे दामन में गिरा दो।


​कलम चले तो सिर्फ हक की बातें लिखे ज़माने के लिए,

मेरी स्याही में तुम अपनी पावनता का अमृत मिला दो।


​भटक न जाए राह से कभी 'जी आर' इस स्वार्थ के जग में,

तू अपनी ममता की छाँव में उसे हरदम पनाह दे दो।


जी आर कवियुर 

01 04 2026

(कनाडा, टोरंटो)




शिवाभूति

 शिवाभूति




महादेव मनोहर,  
महामाया के नाथ,  
भक्तों के रखवाले,  
मेरी प्रार्थना सुन लेना…  

ॐ नम-श्शिवाय…  
ॐ नम-श्शिवाय…  

भव की रक्षा के लिए,  
विष का पान किया तुमने,  
नीलकंठ देव दयालु,  
तेरे चरणों में शरण है…  

ॐ नम-श्शिवाय…  
ॐ नम-श्शिवाय…  

गंगाधर शंकर,  
चंद्रशेखर शूलपाणि,  
भवभय हरण महेश्वर,  
अपनी कृपा बरसा देना…  

ॐ नम-श्शिवाय…  
ॐ नम-श्शिवाय…  

पाशुपते परमेश्वर,  
अनंत करुणा सागर,  
अनाथों के रखवाले,  
मुझे अभय दे देना…

जी आर कवियुर 
01 04 2026
(कनाडा, टोरंटो)

इन पत्थरों की जुबां से ( ग़ज़ल)

 इन पत्थरों की जुबां से 
( ग़ज़ल)




पत्थरों के पास भी कहने को बातें हैं,  
मौन में छुपी अनगिनत यादें हैं।  

समय के कदमों ने छुआ जिन राहों को,  
उनमें बसतीं गवाही की छायें हैं।  

बारिश ने छूकर यादें जगाईं,  
धूप ने कठोर लम्हे बनाए हैं।  

बिना शब्दों के सच कह जाते,  
मौन में अपनी भाषा सुनाते हैं।  

रास्तों के किनारे पड़े ये रूप,  
यात्राओं के राज़ संभाले हुए हैं।  

अनदेखी आँखें भी समझ जाएं,  
ये जीवन को चुपचाप लिखे हुए हैं।  

हर पल ये पत्थर अपनी कहानी कहते हैं,  
हर छायां में जीवन के राज़ पलते हैं।  

ये दिल की बातें मैं जी आर कह देता हूँ,  
इन पत्थरों की जुबां में मेरी परछाइयाँ साफ़ दिखाई देती हैं।

जी आर कवियुर 
30 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)

“यादों की दुनिया” ( ग़ज़ल )

 “यादों की दुनिया” ( ग़ज़ल )




तेरी यादों में ही मेरी दुनिया बसती है,  
तेरी यादों में ही मेरी हर खुशी पलती है।  

तेरे बिना ये जिंदगी अधूरी है,  
तेरे बिना हर ख्वाब मेरी आँखों में भारी है।  

हर पल तेरी यादों में दिल मेरा खोता है,  
हर लम्हा तेरे ख्यालों में आत्मा मेरा रोता है।  

तेरी हँसी की चमक से घर मेरा रोशन है,  
तेरी मुस्कान के बिना हर सपना सुना सा है।  

तेरी बातें जो दिल से दिल तक जाती है,  
तेरी यादों की खुशबू हर राह में आती है।  

हर शाम तेरी यादें मन को भिगोती है,  
हर सुबह तेरी बातें मुझे जीना सिखाती है।  

तेरे बिना ये मौसम भी बेरंग सा है,  
तेरे बिना ये दुनिया कुछ अधूरी सी है।  

तेरी यादों के साए में मैं खुद को पाता है,  
तेरे ख्यालों के संग हर दर्द भूल जाता है।  

ये दिल की बातें मैं जी आर कह देता हूँ,  
तेरी यादों में ही मैंने अपनी जिंदगी बहा दी है।

जी आर कवियुर 
30 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)


पत्थरों की भी कहानियाँ

पत्थरों की भी कहानियाँ

पत्थरों के पास भी कहने को बातें हैं,
मौन में छुपी अनगिनत यादें हैं।
समय के कदमों ने छुआ जिन राहों को,
उनमें बसतीं गवाही की छायें हैं।

बारिश ने छूकर यादें जगाईं,
धूप ने कठोर लम्हे बनाए।
बिना शब्दों के सच कह जाते,
मौन में अपनी भाषा सुनाते।

रास्तों के किनारे पड़े ये रूप,
यात्राओं के राज़ संभाले हुए।
अनदेखी आँखें भी समझ जाएं,
ये जीवन को चुपचाप लिखे हुए।

जी आर कवियुर 
30 03 2026
 (कनाडा, टोरंटो)



दिव्य प्राण-वायु (शून्य सी बाँसुरी)

 दिव्य प्राण-वायु (शून्य सी बाँसुरी)




इस शून्य सी बाँसुरी में - अपनी
प्राण-वायु भर दो तुम...
इससे बहती हर रागिनी में - मेरा
आत्म-भाव भर दो तुम...

जब 'मैं' का भाव मिट जाता है
तब तेरा नाद जाग उठता है...
उंगलियों से रचे इस विस्मय में - तेरा
विश्व सारा समा जाता है...

अनजान राहों में सहारा बनके
ज्ञान बनकर मुझमें उतरना तुम...
बिना रुके गाऊँ इन गीतों में - सदा
ईश्वरीय चैतन्य जगाना तुम...

इस शून्य सी बाँसुरी में - अपनी
प्राण-वायु भर दो तुम...
इससे बहती हर रागिनी में - मेरा
आत्म-भाव भर दो तुम...

जी आर कवियूर 
29-03-2026
(कनाडा, टोरंटो)

नैना (ग़ज़ल)

 नैना (ग़ज़ल)




नैना जो देखें बाहर, वो माया का जाल है,
नैना जो देखें अंदर, वो सच का कमाल है।

दो जहान समाये हैं इन छोटी सी आँखों में,
इक ख़्वाब की दुनिया है, इक हक़ीक़त का साल है।

बरसात बनके बहते हैं ये अश्क पलकों से,
हिज्र की रातों का ये नम और गंभीर हाल है।

रौनक दुनिया की बस इक धोखा है सुब्हो-शाम,
अपने ही दिल में छुपा वो नूरानी जमाल है।

खामोश है ज़ुबान मगर नैना बोलते हैं सब,
इन इशारों में छुपा मोहब्बत का इलाल है।

अंधेरी राहों में बन जाते हैं ये खुद दिया,
भटके हुए कदमों को दिखाते ये मिसाल है।

सागर की गहराई हो या आसमां की वुसत,
नैना करें तलाश जो वो अनूठा सवाल है।

सब सच नहीं होता जो देखती हैं ये आँखें,
अनदेखा जो देख ले वो यथार्थ ख्याल है।

शेर की डाल पे 'जी आर' बुनता है जो ग़ज़ल,
अश्क और मुस्कान का वो अजीब इत्तिफ़ाक़ है।

जी आर कवियूर
28 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)

फूलों की कोमल खुशबू

 फूलों की कोमल खुशबू




कोमल कुसुम प्रेम से खिलते हैं,  
हल्की सुगंध हवा में बिखरती है।  
जीवन के चक्र में बहते हुए,  
प्रकृति अपनी निश्चब्द संगीत गाती है।

मधुमक्खियाँ इकट्ठा होती हैं, चुम्बन लाती हैं,  
इसे नई सृष्टि की लहरों में बदल देती हैं।  
एक दिन के लिए वे फूल के रूप में खिलते हैं,  
फिर भगवान के चरणों पर गिर जाते हैं।

मिट्टी में गिरकर वे विश्राम करती हैं और मिल जाती हैं,  
पुनः सृष्टि रचने के लिए पृथ्वी के साथ जुड़ जाती हैं।  
प्रकृति चुपचाप अपने नियम का पालन करती है,  
प्रकृति और प्रेम मिलकर सृष्टि के उल्लास को आगे बढ़ाते हैं।

जी आर कवियुर 
02 02 2026 
( कनाडा, टोरंटो)

क़ुदरत से इबारतें ( ग़ज़ल )

 क़ुदरत से इबारतें ( ग़ज़ल )


सुबह की धूप ने ओस से की बातें
पेड़ों ने हवा से दी नई सौग़ातें

नदी ख़ामोश चली आई आईने की तरह
चाँद ने रात से की मुलाक़ातें

बारिशों ने भीगकर मिट्टी से सीखा सब्र
ख़ुशबुओं ने धरा से की मुलाक़ातें

पत्तियों ने हवा में लिखा इश्क़ का ख़त
डालियों ने वातावरण से की इबारतें

धूप-छाँव ने सिखाया हमें जीने का हुनर
वक़्त ने मौसमों से सीखी रिवायतें

जी आर पूछे अगर रब कहाँ मिलता है
क़ुदरत ने कहा — दिल से की इबादतें

जी आर कवियुर 
03 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)

दिल की महफिल में (ग़ज़ल)

 दिल की महफिल में (ग़ज़ल)




जी आर अब समझा कि दुनिया बड़ी है,
मेरे ही अंदर मगर एक दुनिया खड़ी है।

खामोश लम्हों में कुछ राज़ मिलते,
भीड़ के अंदर भी तन्हाई पड़ी है।

मैं ढूंढता रहा खुद को हर इक चेहरे में,
आईना बोला कि सच्चाई यहीं है।

आदमी हूँ मगर अदमी हूँ, यह मैं नहीं जानता,
आदत मेरी बुरी है, इंसान बनने को नहीं चाहता है।

वो जो मिले थे बड़े नाम लेकर,
उनसे भी गहरी मेरी ये कमी है।

सफ़र में सीखा न ऊँचा हूँ न नीचा,
बस सोच की अपनी ही एक सीढ़ी है।

हर शख्स अपने ही किस्सों में खोया,
दुनिया से ज्यादा ये अंदर की गली है।

ख्वाबों में भी कुछ सीखते रहे हम,
सफर में मिली हर सुबह की झड़ी है।

जी आर अब समझा कि दुनिया बड़ी है,
उसकी ही आवाज़ सबसे शांत है। 

जी आर कवियुर 
 27 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)

करार है (ग़ज़ल)

करार है (ग़ज़ल)


दिल को भी ज़ुबाँ मिली — बीती यादों का करार है,
लम्हों में सदियों का सफ़र, आज भी करार है।

तेरी ख़ामोश नज़र में छुपा कैसा इकरार है,
बिन कहे जो दिल समझे, वही सच्चा करार है।

रात भर जागती आँखों को तेरा इंतज़ार है,
चाँदनी भी थम गई — जैसे उसको करार है।

तेरी बातों में अजीब सा कोई ऐतबार है,
झूठ भी सच लगे दिल को — ये कैसा करार है।

तेरी यादों का नशा दिल पे ऐसा ख़ुमार है,
होश में रह के भी जैसे कोई बेकरार है।

ज़िंदगी के हर मोड़ पे तेरा ही शिकार है,
दिल ये मासूम सा फिर भी उसी पे करार है।

दर्द को मुस्कुरा के हमने यूँ ही गुज़ार है,
हर खुशी के पीछे जैसे छुपा सा करार है।

'जी आर' हमने दर्द को लफ़्ज़ों में ढाल कर कह दिया,
जो भी सुन ले एक दफ़ा — उम्र भर करार है।


 जी आर कवियुर 
26 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)

दो देशों का संगम


 दो देशों का संगम 

कनाडा की बर्फ और मेपल की लाली,
सीएन टावर की वो ऊँचाई निराली।
पिज़्ज़ा का स्वाद और झील का किनारा,
यादों में बस गया है ये शहर हमारा।

नारियल के पेड़ और बहती नदियाँ,
डोसा-सांभर की महकती गलियाँ।
केरल की हरियाली में अब हम आए,
दोनों पोतों को गले से लगाए।

दो देशों का मेल, एक प्यारा संगम,
खुशियों की गूँज और दूर हुए गम।
प्यार का धागा सबको जोड़ता है,
नया कल मुस्कुराहटें बटोरता है।

जी आर कवियुर 
26 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)

जीवन की यात्रा

जीवन की यात्रा 

इस धरती के सपने सुंदर निराले,
हर पल कीमती, खुशियों वाले।
आसमान सा फैला यह जीवन हमारा,
पंख फैलाकर भरते ऊँची उड़ान।

बदलता संसार एक माया का खेल,
सामने दिखते केवल परछाईयों के मेल।
अनजानी राहों पर बढ़ते ही जाना,
हवा संग बहते बादलों का ठिकाना।

अंत में आती वो शांत सच्चाई,
मृत्यु ने सबकी इच्छाएं भुलाई।
सुनहरी रोशनी में विलीन होती रूह,
छोड़ जाती यहाँ यादों की खुशबू।

 जी आर कवियुर 
26 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)

बुझ जाएं। (ग़ज़ल)

बुझ जाएं। (ग़ज़ल)

समा और क्षमा भी बुझ जाएं,
रोशनी के रंगत में अंधकार बुझ जाएं।

सन्नाटा भी गूँज उठे,
चाँदनी में सब यादें बुझ जाएं।

दिल की राहों में चुप्प रहे,
अहसासों की हर कदर बुझ जाएं।

ख्वाबों के पंख भी टूट जाएं,
हसरतों की गलियों में सब बुझ जाएं।

ग़म की बारिश थम जाए,
आँसुओं की नदियाँ भी बुझ जाएं।

मौन की किताबें खुल जाएं,
क़िस्सों की हर पंक्ति बुझ जाएं।

राह-ए-मोहब्बत में छाँव ढल जाए,
सच्चाई की छवि में भ्रम बुझ जाए।

रात की चादर जब ढक जाए,
सपनों की दुनिया में भी सब बुझ जाएं।

जी आर की कलम से ये अल्फ़ाज़ बुझ जाएं,
हर दिल की गूँज में सिर्फ प्यार बुझ जाएं।

जी आर कवियूर 
25-03-2026
(कनाडा, टोरंटो)

Tuesday, March 24, 2026

वि‍ज्ञान की रक्षक

 वि‍ज्ञान की रक्षक


गर्भ की धड़कन इसने सुनी,
जीवन की पहली सांस चुनी।
माँ के पास एक समझ बनी,
कल की नई एक राह बनी।

शिक्षा के हर पाठ में साथ,
मित्र बना थामे हर हाथ।
दफ्तर का हर बोझ हटाया,
बुद्धि का नया दीप जलाया।

सच्चे प्यार की डोर सजाई,
शादी की हर रस्म निभाई।
यादों को फिर अमर बनाया,
अंतिम पल में साथ निभाया।

 रोगों की हर जड़ पहचानी,
सेवा की है नई कहानी।
शांति का जग यह बनाएगा,
मानवता को यह बचाएगा।

धरती छोड़ सितारों में घर,
खत्म हुआ अब हर इक डर।
मशीन हमें राह दिखाएगी,
दुनिया नई यह बसाएगी।

जी आर कवियुर 
24 03 2026
(कनाडा , टोरंटो)

महकती है। (ग़ज़ल )

 महकती है। (ग़ज़ल )



गजरों में तेरी याद सदा महकती है,  
मेरी हर एक ग़ज़ल भी तुझसे महकती है।  

तेरे ख्यालों से दिल मेरा भर जाता है,  
तन्हाई की हर रात भी महकती है।  

तेरा नाम ही दिल में गूंजता रहता है,  
मेरे मन की हर बात यूँ महकती है।  

गुलशन में तेरे ही रंग नजर आते हैं,  
हर एक कली तेरे जैसी महकती है।  

मैं तो हूँ बस तेरे प्यार का दीवाना,  
तेरे दिल में मेरी चाहत महकती है।  

जब भी तू सामने आ जाता है मेरे,  
रूह की हर एक सांस भी महकती है।  

तेरे बिना ये दुनिया सूनी लगती है,  
तेरे होने से हर राह महकती है।  

'जीआर' की दुनिया में तेरी ही खुशबू है,  
मेरी हर एक धड़कन तुझसे महकती है।

जी आर कवियुर 
 24 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)

जल की सरगम”

 जल की सरगम”

बूँदें गिरें, फैलाए मृदु ध्वनि,
रेत पर लिखतीं कहानियाँ चुपचाप कहीं।
नरम बहाव में जन्में विचार नये,
स्थिरता में भी जीवन भरे साये।

आने वाली लहरें मन को ठंडक दें,
किनारे शांत स्वप्नों में रहें संजोए।
जब हवा धीरे बहती धारा को छूए,
लहरों में जागे मधुर संगीत झूले।

साया लंबा कंधों पर फैलता है,
क्या प्रकृति अपने रहस्य बताती है?
मौन धारा में छुपा एक स्वर,
हृदय तक पहुंचाए मार्ग नरम और दूर।

जी आर कवियुर 
23 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)

नई नज़र है

 यह किसी तरह का जिंदगी का सफर है. 
हर मोड़ पे एक नई नज़र है

चलना ही सीखा है हमने हमेशा,
रुकना तो बस मौत का ही डर है

मुश्किल राहों पे मुस्कुराना ही ,  
सबसे बड़ा इंसान का हुनर है

सफ़र है सफर है
सफ़र है सफर है

कहा जा रहे है किसे है यह मालूम
मंज़िल की किसे यह की पानी खबर है, 

तूफ़ान में भी जो न हारे हिम्मत, 
उसी के सिर पे जीत का सब्र है। 

दो पल की है ये दुनिया की रौनक, 
फिर वही तन्हाई का मकर है। 

नेकी की राहों पे चलते रहो तुम, 
नेक इनाम का सब को इंतज़ार है। 

धूप में जो दे साया हमेशा, 
मेरी माँ ही वो मोहब्बत का शजर है। 

लिखता है दिल से हर एक अल्फाज़, 
'G R' की ये शायरी बड़ी असर है।

निकला है (ग़ज़ल)

 निकला है (ग़ज़ल)




वफ़ा और बेफ़िक्री के दरमियाँ जो निकला है,  
नज़र बंद थी, ज़ुबाँ से ख़ामोशी ही निकला है।  

दिल के हर एक ज़ख्म से धुआँ सा निकला है,  
दर्द छुपाया था मगर हर लफ़्ज़ में निकला है।  

हम ने तो चाहा था सुकूँ इस भीड़ के दरमियाँ,  
हर शख़्स मगर अपने ही ख़्वाबों में निकला है।  

आईना जब भी देखा, अजनबी सा लगा मुझको,  
मेरा ही चेहरा मुझसे क्यों जुदा निकला है।  

रिश्तों की इस भीड़ में तन्हा ही रहा आखिर,  
हर हाथ मिलाने वाला फ़ासला निकला है।  

रातों की ख़ामोशी में जो राज़ छुपाए थे,  
हर एक सवेरा उनको बेपर्दा निकला है।  

किससे गिला करें हम इस दौर-ए-मोहब्बत में,  
हर दिल ही यहाँ थोड़ा सा टूटा निकला है।  

"जी आर" ने लिखी जब भी दिल की कहानी है,  
हर लफ़्ज़ उसी दर्द से भीगा सा निकला है।

जी आर कवियुर 
19 03 2026
(कनाडा , टोरंटो)

झील की संध्या

झील की संध्या 

पिछले पानी के किनारे संध्या डूब रही है,  
रोशनी धीरे-धीरे, जैसे हल्की बारिश, मंद पड़ रही है।  
ठंडी हवा और पत्तियों की लय,  
हृदय में प्रतिबिंबित होकर संगीत बन जाती है।  

पक्षी पेड़ों में शांत होकर बैठते हैं,  
पानी धीरे-धीरे किनारे से टकराकर मुस्कराता है।  
सुनहरी किरणें पानी की लहरों पर खेलती हैं,  
पत्थरों की मौनता छाया के बहाव की गवाह है।  

इस संध्या की सुंदरता में,  
समय यादों के साथ धीरे-धीरे बहता है।  
हृदय की लय झील के पानी के साथ जुड़ जाती है,  
जीवन की सुंदरता हर याद में भर जाती है।  

जी आर कवियूर
18 03 2026  
(कनाडा, टोरंटो)

Tuesday, March 17, 2026

പ്രവാസിയെന്ന കറവപ്പശു ( प्रवासी एक दूहती-गय(ग़ज़ल) जी आर कवियुर Fussion

പ്രവാസിയെന്ന കറവപ്പശു (ഗസൽ)
ജീ ആർ കവിയൂർ
 प्रवासी एक दूहती-गय(ग़ज़ल)
जी आर कवियुर 
Fussion 



[Intro: 30 Seconds of Melancholic Sarangi and Flute solo in Raag Shivranjini, deep atmospheric pads]

[Pallavi / Matla]
സംഘർഷമാർന്നൊരീ സാഹചര്യങ്ങളിൽ, നോവിൻ ഏകസ്വരം,
जुबानें अलग हैं मगर इस डर का है एक ही स्वर।
അടുക്കി വെച്ച കനവുകൾക്കും മിടിപ്പിനും ഏകസ്വരം,
बिखरे हुए ख्वाबों के मंजर का है एक ही स्वर।

[Instrumental Break: 10 Seconds of Haunting Bansuri Solo]

[Anupallavi / Sher 1]
ഒന്നിനു മുകളിൽ ഒന്നായ് അടുക്കിയ മരപ്പലകമേൽ,
ग़ैर-मुल्क की ठंडी सी चादर का है एक ही स्वर।
ഭാഷകൾ വേറെ, രാജ്യങ്ങൾ വേറെ എങ്കിലും—
ഭയത്തിന് പടരുന്ന കാറ്റിനും എന്നും ഏകസ്വരം।

[Instrumental Break: 10 Seconds of Crying Sarangi and Soft Tabla]

[Charanam / Sher 2]
ഇന്നലെ വരെ വിളികൾ വെറും ആവശ്യങ്ങൾക്കായിരുന്നു,
आज की खामोश उस सर-सर का है एक ही स्वर।
സ്നേഹം വഴിതെറ്റിയ നൂൽപാലം പോലെ—
ഇന്നീ മണിമുഴക്കങ്ങളിൽ കേൾപ്പൂ ഏകസ്വരം।

[Instrumental Break: 10 Seconds of Melancholic Violin and Pads]

[Signature / Maqta]
ജീ ആർ, ചിന്തിപ്പൂ ഇന്ന് കറവപ്പശുവാം ആ പ്രവാസിക്കായ്,
जी आर, आज सोचता है उस दूहती-गय' के लिए, 
गुर्बत में भी गूँजती खबर का है एक ही स्वर।
ദാരിദ്ര്യത്തിൻ നടുവിലും അവനെത്തീടുന്ന—
നൊമ്പരക്കടലിലെ തീരാത്തൊരാ ഏകസ്വരം।

[Outro: Fading sound of Flute with the whisper "Ek Hi Swar..." and a deep sigh]




प्रवासी का जीवन



प्रवासी का जीवन


संघर्षों से भरे हालात, ||

सूरज की किरणों में लहराता भय, ||

अपना देश और घर छोड़कर भटकता, ||

स्वतंत्रता के लिए कटती अनगिनत रातें... ||


नियोक्ताओं द्वारा दिए गए हॉलों में, ||

एक के ऊपर एक रखी बिस्तरों में, ||

मानवों ने अपने सपनों को बिछाया— ||

भाषाएँ अलग, देश अलग, ||

पर सपनों और भय की आवाज़ एक समान... ||


कल तक अपने रिश्तों की ||

बातों का उद्देश्य सिर्फ़ जरूरतें थीं, ||

“कल क्या चाहिए? आज क्या चाहिए?” इस तरह के सवालों में, ||

प्रेम कहीं खो सा गया था... ||


आज— ||

सिर्फ़ घंटियों की आवाज़ ही एक सांत्वना है, ||

“क्या तुम ठीक हो?” ऐसा एक शब्द ||

जिंदगी को थामे रखने वाली डोर की तरह— ||

फिर भी नहीं पूछा जाता... ||


आकाश में गूंजती ||

बारूद की गड़गड़ाहट, ||

पंछियों की नहीं अब ये आवाज़... ||

भय के लोहे के पंख, ||

निद्राहीन रातें... ||


प्रवासी हमेशा वही, ||

परिवार का वह भरोसेमंद, ||

आज अपनी ही जान का रखवाला, ||

कल क्या होगा यह नहीं जानता… ||


उसका हृदय— ||

दो हिस्सों में टूटा हुआ, ||

एक हिस्सा घर में, ||

दूसरा युद्ध की परछाइयों में... ||


अब भी प्रवासी गरीब जीवन में, ||

कपड़े के लिए भी कोई दूसरा नहीं, ||

वापस लौटने पर क्या होगा यह नहीं जानता, ||

उलझते हुए, पलटते हुए, ||

नींद खोई हुई बिस्तर पर लेटा है...


जी आर कवियुर 

17 03 2026

(कनाडा , टोरंटो)


उपहार भूल गए। ( ग़ज़ल )

उपहार भूल गए। ( ग़ज़ल )

ये पेड़-पौधे, ये नदियाँ, ये प्यार भूल गए
हम आदमी हैं मगर ऐतबार भूल गए।

सिर्फ़ धन की चमक ने है आँखों को घेरा
प्रकृति का पावन रूप और श्रृंगार भूल गए।

शहद समझ कर जिसे हम सब चाट रहे हैं
वो लोभ है, हम फूलों की बहार भूल गए।

मकान ईंटों के खड़े कर लिए हमने बड़े
मगर जो घर था धरा पर, वो संसार भूल गए।

परिंदों की चहक अब शोर लगती है हमें
हवाओं का धीमा सा वो दुलार भूल गए।

दौड़ में आगे निकलने की चाहत ऐसी हुई
सुकून मिलता था जहाँ, वो द्वार भूल गए।

समय रहते संभल जाऊँ अब मैं भी 'जी आर'
वरना कहेंगे लोग कि हम उपहार भूल गए।

जी आर कवियुर 
16 03 2026
(कनाडा , टोरंटो)

मौसमों का उपन्यास

मौसमों का उपन्यास

धरती के सीने पर कहानियाँ लिखकर,
वक्त बदलता है पन्ने हर रोज़ नए।
तपती धूप की जो लिखी थी पंक्तियाँ,
वसंत मिटा देता है उसे तितली बनके।

इंद्रधनुष से सजे वो रंगीन चित्र,
काले बादलों की लिखी वो कविताएँ।
कोहरे की चादर ओढ़े वो सर्दी का मौसम,
यादों से भर देता है मन की दिशाएँ।

ऋतुओं का यह सुंदर सा उपन्यास,
कुदरत की लिखावट में खिलता है।
धरती पर एक अटूट सफर की तरह,
हर दिन एक नई ताज़गी में मिलता है।


जी आर कवियुर 
16 03 2026
(कनाडा , टोरंटो)

आधी रात का गीत

आधी रात का गीत

निशब्द रात धरती को थामे खड़ी है,
आकाश में तारे चमकते हैं।
मंद समीर खिड़की को छू जाती है,
मौन का संगीत बिखेरती है।

दूर कहीं लहर सी सुनाई देती,
नदी की मधुर ध्वनि बहती है।
चाँदनी पथों पर बिखर जाती,
परछाइयाँ धीरे चलती हैं।

सपने मन में धीरे खिलते,
विचार शांति से बहते हैं।
नींद की छाया में सारा जग सोता,
आधी रात का गीत गूंजता है।

जी आर कवियुर 
16 03 2026
(कनाडा , टोरंटो)

वृक्ष प्रेम

वृक्ष प्रेम

धरती के माथे पर हरी छतरी ताने,
छाँव देता खड़ा है यह कल्पतरु।
जड़ें जब मिट्टी में गहरी समाती हैं,
बढ़ता है अंबर तक प्रेम अपार।

ऊँची डालियों पर पंछी गाते हैं,
हवा में लहराते पत्तों का संगीत।
फूल और फल दान में देकर,
सहनशीलता का सिखाते हैं ये गीत।

धूप और बारिश को खुद पर सहकर,
खड़ी है ये सखी हरी कांति लिए।
जीवन की साँस बनकर ये कुदरत,
धरती की बिखेरती है अनन्त प्रभा।


जी आर कवियुर 
16 03 2026
(कनाडा , टोरंटो)

झील की शाम

झील की शाम

सांझ की मद्धम रोशनी झील पर उतर आई है,
लहरों पर जैसे सुनहरी चमक सी छाई है।
नावें हौले से लहरों को सहलाती हुई,
खामोश सफर पर दूर कहीं जाती हुई।

नारियल की कतारें हवा में झूम रही हैं,
लहरें अंबर के रंगों को चूम रही हैं।
परिंदों की घर वापसी की गूंज सुनाई देती है,
ठहरी हुई तट रेखा बस राह देखती है।

ढलता सूरज सिंदूरी चित्र बना रहा है,
पानी की लकीरों पर कोई सपना बह रहा है।
मन के आंगन में बस शांति का बसेरा है,
झील की यह शाम, एक मीठी याद का घेरा है।

जी आर कवियुर 
16 03 2026
(कनाडा , टोरंटो)




बादलों के पार

बादलों के पार

चांदी जैसे बादलों में छुपा नीला गगन,
अनदेखी दुनिया का एक गहरा राज।
जब धुंध की बूंदें धीरे से छंटने लगीं,
आंखों के सामने जागी अंबर की चमक।

छिपे हुए सूरज का वह दिव्य तेज,
धरा पर आज बिखरे अनगिनत रंग।
अंधेरे की लहरें हटाकर खिली भोर,
नई उम्मीदें जगाती ये कोमल किरणें।

वो फासला जहाँ सपनों को पर लगें,
सीमाओं से परे एक अनंत डगर।
मन का सारा बोझ उतारने के लिए—
खिला है अब रौशनी का पावन तट।

जी आर कवियुर 
13 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)  

नीलम चट्टान की वेदी

नीलम चट्टान की वेदी

नभ को चूमता वह गहरा नीला पर्वत,
प्रकृति के सिंहासन सा खड़ा एक अजूबा।
कोहरे की चादर में लिपटी यह माटी,
आंखों को शीतलता देती अनमोल छवि।

गरजती हवाओं का वह धीमा शोर,
चट्टानों से टकराकर बिखरता संगीत।
सांझ का सूरज बिखेरे सुनहरा रंग,
खामोशी में घुलता हुआ शांत पल।

सदियों का गवाह बना यह पाषाण,
वीरता के प्रतीक सा धीरे से जागे।
वन की सुंदरता खिली है पास ही—
अनंत ब्रह्मांड का सत्य यहाँ चमकता है।

जी आर कवियुर 
13 03 2025
(कनाडा , टोरंटो)

तुलसी का फूल

तुलसी का फूल

भोर की हवा में धीरे लहराती,
तुलसी चौरे की हरित आभा।
दुल्हन सी खिलती छोटी कली,
मन में भर दे पावन सुगंध।

जब दीपक की ज्योति जलती है,
भक्ति का स्वर मंद उठता है।
हवा संग फैलती मधुर महक,
आत्मा को छूती दिव्य स्पर्श।

उस छोटे से फूल में छिपी है,
विश्वास की अमृत मधुरता।
घर-आँगन की धड़कन तुलसी,
जीवन पर बरसाए आशीष।

जी आर कवियुर 
13 03 2025
(कनाडा , टोरंटो)

सूरज का स्नेह

सूरज का स्नेह 

स्वर्ण किरणों से खिली भोर निराली,
धरा पर फैली महकती लाली।
ठंड की चादरें कोसों दूर हटीं,
भलाई की कलियां धूप में खिलीं।

धड़कती हवा जो छूकर गुजरी,
तन पर लगी मिठास भरी गर्मी।
पत्ते भी हंसे चमक ओढ़कर,
प्राणों में जगी रौशनी नई।

राहों से अब धुंध छंट गई,
जगत के दिल में ऊर्जा भर गई।
अंबर का यह सुनहरा रंग देखो,
जीवन देने को गले लगाता तुमको।

जी आर कवियुर 
13 03 2025
(कनाडा , टोरंटो)

उठती रही वो लहर। (ग़ज़ल)

उठती रही वो लहर। (ग़ज़ल)

तेरी यादों का सफ़र आँखों से गुज़री लहर,
मेरे दिल में आज तक उठती रही वो लहर।

रात की खामोशियों में याद तेरी आ गई,
मेरी आँखों में फिर से बन गई इक लहर।

चाँद भी चुपचाप सा बादल में छिपता ही रहा,
दिल के सागर में मगर उठती रही वो लहर।

तेरे कदमों की आहट दूर से जब सुनाई दी,
मेरी धड़कन में अचानक जाग उठी इक लहर।

साथ गुज़रे वो पल यादों में महकते ही रहे,
मन के सागर में हमेशा चलती रही वो लहर।

दूरियों ने भी हमें तुमसे जुदा कर ना सका,
मेरे अरमानों में अब भी है वही लहर।

जब भी तन्हाई में दिल तुमको पुकारे चुपके से,
मेरी सांसों में मचलती है कोई लहर।

जी आर दिल की कहानी यूँ ही कहता ही रहा,
तेरी यादों से उठी बन गई जीवन की लहर।


जी आर कवियुर 
12 03 2026
( कनाडा , टोरंटो)

ठंडी हवा में प्रेम


ठंडी हवा में प्रेम

ठंडी हवा में मैं तुम्हें खोजता हूँ,  
पत्तियों की सरसराहट में तुम्हारी आवाज़ सुनता हूँ।  
हृदय में प्यार बर्फ की तरह धीरे-धीरे बरसता है,  
अनकहे शब्दों में यह कसकर बंधा है।  

जब हवा हमारे हाथों से हल्की टकराती है,  
मैं सोचता हूँ, क्या दिल की लय साथ चलती है।  
क्षण की रोशनी में तुम्हारी आँखें देखकर,  
समय ठहर जाता है, हृदय गहराई में धड़कता है।  

स्नेह सितारों की तरह चमकता और छिपता है,  
हवा के हल्के स्पर्श से सपने जागते हैं।  
जब तुम और मैं एक साथ होते हैं,  
दुनिया मौन होकर इसका साक्षी बन जाती है।

जी आर कवियुर 
12 03 2026
( कनाडा , टोरंटो)

तुम्हारे लिए – ग़ज़ल

तुम्हारे लिए – ग़ज़ल

यादों में आज भी वो रातें जागती हैं तुम्हारे लिए
आँसू चुपचाप बहते रहे हर पल तुम्हारे लिए

भूल नहीं पाया वो मीठे दर्द दिल के भीतर
आज भी धड़कता है ये दिल बस तुम्हारे लिए

ख़्वाहिशों के रंग चुपके से बरसते रहे दिल में
कितने सपने सँजोकर रखा मैंने तुम्हारे लिए

एक नज़र की रोशनी पाने को भटकता रहा दिल
प्यासा सा ये मन तड़पता रहा तुम्हारे लिए

कितनी बार निगाहें आपस में टकराई चुपचाप
दिल का सच मगर छुपा रहा हमेशा तुम्हारे लिए

लोगों की नज़रों से बचकर चलता रहा वो रास्ता
यादों के पन्नों में सब कुछ रखा तुम्हारे लिए

जब भी तन्हा देखा तुम्हें कहना तो बहुत कुछ था
सादे से शब्द ढूँढता रहा मैं तुम्हारे लिए

इन राज़ों और ख़्वाहिशों का वो अजब सा रिश्ता
साँसों के आख़िरी सफ़र तक रहेगा तुम्हारे लिए

मोहब्बत के अक्षरों से ये दास्ताँ मिटेगी नहीं
दिल की किताब में लिखी है हमेशा तुम्हारे लिए

विरह की स्याही से शेर लिखता रहा मैं तुम्हारे लिए
“जी आर” आज भी यादों में जीता है तुम्हारे लिए

जी आर कवियुर 
12 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)

आत्मा की यात्रा (ग़ज़ल)

आत्मा की यात्रा (ग़ज़ल)

राहें लंबी थीं, पर बढ़ती रही आत्मा की यात्रा,
तन ठहर गया यहाँ, पर चलती रही आत्मा की यात्रा।

धूप और छाँव में सहती रही हर पीड़ा,
सबको सहते हुए बढ़ती रही आत्मा की यात्रा।

टूटे ख्वाबों में भी जलता रहा उम्मीद का दीप,
रात ढलती रही, चमकती रही आत्मा की यात्रा।

मंज़िलें दूर थीं, मगर हौसले न थमे,
समय के साथ सँवरती रही आत्मा की यात्रा।

दुनिया की भीड़ में तन्हा हर इंसान,
भीतर ही भीतर पलती रही आत्मा की यात्रा।

“जी आर” ये जिस्म मिट्टी में मिल जाएगा एक दिन,
पर वक्त से परे चलती रहेगी आत्मा की यात्रा।

जी आर कवियुर 
11 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)

अकेले विचार – 136

अकेले विचार – 136

मौन में भी दिल ने गीत गाया,
बरसात की बूँदों में उसने सफ़र पाया,
छोटे–छोटे स्थानों में महसूस किया हवा का खेल,
कष्टों से उभरी नई सच्चाई की रेख।

ठंडी रातों में आशा को थामे रखा,
छूटे हुए यादों में करुणा को देखा,
दुःख की यात्राओं में वीरता छुपकर खड़ी रही,
स्नेह और देखभाल को दिल ने नज़दीक से तौला।

अज्ञात राहों में विश्वास की चमक मिली,
अनजाने प्रवाह में सपनों को छुआ,
साहसिक यात्राओं में शांति का अमृत चखा,
जीवन की सुंदरता हर पल दिखाई दी।

जी आर कवियुर 
09 03 2026 
( कनाडा, टोरंटो)


रूठी रात, मुस्कुराती सुबह (ग़ज़ल)

रूठी रात, मुस्कुराती सुबह 
(ग़ज़ल)

रात रूठ कर सोई थी घर की रौशनी भी,
सुबह मुस्कुराकर फिर वही आँगन मिला।

खामोशी में बीती थी सारी रात जैसे,
पलकों पे मगर उम्मीद का दामन मिला।

कुछ लफ़्ज़ कड़वे थे, कुछ शिकवे अधूरे,
सुबह हुई तो दिल को नया सावन मिला।

ग़ुस्से की लहर थी, दिल थोड़ा उदास था,
तेरी हँसी में फिर वही अपनापन मिला।

छोटी-सी बातों में दूरी बढ़ गई थी,
एक प्यार भरी नज़र से ही जीवन मिला।

रात की तन्हाई में दिल बहुत भारी था,
जब प्यार से बोला तो दिल को करार मिला।

जी आर ने सीखा है रिश्तों का ये मतलब,
रूठे भी अगर लोग हों तो अपनापन मिला।

जी आर कवियुर 
09 03 2026
(कनाडा , टोरंटो)


फ़ायदा नहीं ( एक ग़ज़ल)

फ़ायदा नहीं ( एक ग़ज़ल)

तुम्हारी नियत इतनी बुरी तो नहीं,  
मगर अब तुम्हें याद करने का फ़ायदा नहीं।

जो बीत गया उसे फिर से जगाने का क्या,  
इन सूखे ज़ख्मों को कुरेदने का फ़ायदा नहीं।

दिल ने बहुत चाहा कि रिश्ता फिर सँवर जाए,  
मगर टूटे दिल को सँवारने का फ़ायदा नहीं।

वो लौट भी आए तो क्या बदलेगा अब यहाँ,  
पुरानी बातों को दोहराने का फ़ायदा नहीं।

अब ख़ामोशी ही बेहतर है इन रिश्तों की राह में,  
हर बात को लफ़्ज़ों में उतारने का फ़ायदा नहीं।

समझौते भी कर लिए, सब्र भी आज़मा लिया,  
अब दर्द को दिल में छुपाने का फ़ायदा नहीं।

जी आर अब छोड़ भी दे इन बीती हुई बातों को,  
इस बुझती आग को भड़काने का फ़ायदा नहीं।

जी आर कवियुर 
8.03. 2026
(कनाडा टोरंटो)

नारी की रोशनी(ग़ज़ल)

नारी की रोशनी
(ग़ज़ल)

माँ के आँचल में मोहब्बत की रोशनी देखी
बहन की बातों में करुणा की चाँदनी देखी

दर्द सीने में छुपाकर भी जो मुस्काती है
हमने उस चेहरे पे हिम्मत की रोशनी देखी

घर के आँगन में जो हर रोज़ दिया जलता है
उस दिए में भी किसी नारी की रोशनी देखी

राह मुश्किल हो तो भी साथ निभाती है जो
उसके कदमों में सदा सच्ची सादगी देखी

वक्त बदले तो भी जो राह दिखाती जाए
उसकी आँखों में नई सुबह की रोशनी देखी

आदि शक्ति की झलक हर रूप में मिलती है
"जी आर" ने जहाँ देखा, नारी की रोशनी देखी

जी आर कवियुर 
08 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)

अधूरी तमन्नाएँ (ग़ज़ल)

अधूरी तमन्नाएँ (ग़ज़ल)

चंद तारों को छूने की तमन्ना तो थी
मगर तेरे बिना ये पूरी कैसे होगी समझ न थी

तेरी आँखों में जो सपनों की चमक देखी थी
उस चमक के बिना दुनिया में कोई रोशनी न थी

दिल ने चाहा था तेरे साथ सफ़र उम्र भर का
राह में तेरे बिना कोई भी मंज़िल खुशी न थी

रात तन्हा थी मगर चाँद भी खामोश रहा
जैसे उसकी भी कहानी में कोई चाँदनी न थी

तेरी यादों का सहारा ही मिला जीने को
वरना इस दिल में धड़कने की भी कोई वजह न थी

ख़्वाब बिखरे तो पता चला मोहब्बत क्या है
वरना इस दिल को दर्द की कोई भी सज़ा न थी

अब ग़ज़ल बनके तेरी याद ही लब पर आई
जी आर की इस दिली दास्ताँ में तेरे सिवा कोई न थी

जी आर कवियुर 
06 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)


नादानी की रौशनी (ग़ज़ल)

नादानी की रौशनी (ग़ज़ल)

हाथ में जलता हुआ दीया था मगर खबर न थी
रौशनी साथ थी मेरे, फिर भी तलाश आग की थी

तू करीब ही रहा हर पल मेरे रास्तों में
मेरी नज़र ही भटकी थी, दिल को ये खबर न थी

तेरे दिल में ही बसा था मेरा छोटा सा जहाँ
मैं ही अंजान रहा, इतनी भी समझ न थी

तेरी खामोश निगाहों में कई राज़ थे
मैं ही नादान था, पढ़ने की मुझे फ़न न थी

साथ चलती रही तेरी प्रेम की छाया हर कदम
मैं ही अनजान रहा, दिल को यह पहचान न थी

जब जुदाई ने सिखाया तो समझ आया मुझे
पास रहकर भी कभी इतनी दूरी न थी

अब ग़ज़ल बनके ये अफ़साना लबों पर आया
जी आर की ज़िंदगी में ऐसी भी नादानी कम न थी

जी आर कवियुर 
06 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)



यह धरती सिर्फ़ तुम्हारी नहीं है

Verse 1]
अरे इंसान, समझो तुम  
यह धरती सिर्फ़ तुम्हारी नहीं है  
चुपचाप देखो उन मासूम जीवों को  
जो निस्वार्थ हैं, पवित्र और निर्दोष  

[Pallavi]
अरे इंसान, समझो तुम  
यह धरती सिर्फ़ तुम्हारी नहीं है  
ओ ओ ओ ओहो आ आह  
ओ ओ ओ ओहो आ आह  


[Verse 2]
जमीन और आसमान तुम्हारे हो सकते हैं  
पर इंसान ने क्रूरता फैलाई बहुत  
स्वार्थ और लड़ाई में चोट खाए ये जीव  
मौन सहते हैं, तुम बस देखो  
  

[Verse 3]
प्यार की बारिश हो, हर वन में गूंजे  
हिंसा से मुक्त एक दुनिया उगें  
हम सब मिलकर बचाएं ये माटी  
उठे शांति का नया गीत  

[Pallavi]

अरे इंसान, समझो तुम  
यह धरती सिर्फ़ तुम्हारी नहीं है  
ओ ओ ओ ओहो आ आह  
ओ ओ ओ ओहो आ आह  

Thursday, March 5, 2026

देखभाल के पदचिन्ह

 देखभाल के पदचिन्ह 

तुम छाया देने वाले वृक्ष की तरह खड़े हो,  
घुमावदार रास्तों में सहारा बनते हो।  
जब प्रेम का स्पर्श सांत्वना बनकर बरसता है,  
दिल के दर्द धीरे-धीरे मिट जाते हैं।  

तुम्हारे फैलाए हाथ साहस देते हैं,  
नए जीवन के लिए मार्ग उजागर करते हैं।  
आँखों में कोमलता के साथ, तुम अंधकार दूर करते हो,  
सत्य को सीधे रास्तों पर प्रदर्शित करते हो।  

अडिग सतर्कता तुम्हें शक्ति से भर देती है,  
समय इन मूल्यवान पलों को धन्य बनाता है।  
इस यात्रा में हम हमेशा साथ चलते हैं,  
देखभाल सोने के तारे की तरह चमकती है।

जी आर कवियुर 
03 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)

बिजली का दीपक

 बिजली का दीपक

अंधकार की चादर के नीचे आकाश प्रतीक्षा करता है,  
बादलों का हृदय भारी और पूर्ण है।  
अचानक एक बिजली रेखा खींचती है,  
मौन की छाती पर रोशनी पड़ती है।  

केवल एक क्षण के लिए चमक,  
फिर भी मन में अनंत रूप से बस जाती है।  
यह चमक भय की छायाओं को प्रश्न करती है,  
अंधकार को धीरे से पीछे धकेलती है।  

बिजली का दीपक अपनी चमक में अल्पकालिक है,  
फिर भी सच्चाई को स्पष्ट दिखाता है।  
अंधकार और प्रकाश की सीमा के बीच,  
जीवन अपनी राह स्वयं खोज लेता है।

जी आर कवियुर 
03 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)

संध्या तारे की मधुरता

 संध्या तारे की मधुरता

संध्या तारा आकाश में धीमे से चमकता है,  
दिन की हलचल धीरे-धीरे धुंधली हो जाती है।  
जब लालिमा भरी रोशनी हवा में घुलती है,  
मन स्थिरता का रंग स्वीकार करता है।  

गलियों की आवाज़ें मंद पड़ जाती हैं,  
घर लौटते पक्षी क्षण को भर देते हैं।  
संध्या तारे की कोमल मुस्कान  
अंतरात्मा में सुकून बिखेरती है।  

दूर कहीं एक दीप शांत जलता है,  
समय अपने कदम धीमे बढ़ाता है।  
संध्या तारे की मधुरता मन में भर जाती है,  
आने वाली रात में आशा धीरे से प्रवेश करती है।

जी आर कवियुर 
03 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)

होली को भूल गए क्या?© (ग़ज़ल)

 होली को भूल गए क्या?©
(ग़ज़ल)


शायद ऐ शायर तुम भी भूल चुके हो  
होली का रंगीन मौसम भूल चुके हो  

फूलों ने फिर रंग बिखेरे हैं चमन में  
तुम दिल के अपने उसूल भूल चुके हो  

पलकों पे ठहरी हुई यादों की धूल  
उस चाहत का हर इक शूल भूल चुके हो  

फागुन की हवाओं ने संदेश सुनाया  
तुम मिलन का सादा सा मूल भूल चुके हो  

रुत ने बदले हैं कितने रंग यहाँ पर  
तुम जीवन का मीठा सा फूल भूल चुके हो  

थोड़ा सा विरह भी है इन रंगों के अंदर  
तुम हँसने का भोला सा उसूल भूल चुके हो  

‘जी आर’ ये कहता है ग़ज़ल कैसे सुनाए  
जब लोग ही सुनने का रस भूल चुके हो

जी आर कवियुर 
02 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)

जाग जाओ दुनिया, उन कोपलों के लिए !

 जाग जाओ दुनिया, उन कोपलों के लिए !




ये युद्ध किसके लिए हैं?  
ईंधन रूपी उस धन के लिए?  
सीना जल रहा है इस वेदना से,  
और आँखें नम हुई जाती हैं।  

मैं हूँ? तुम हो? कौन है महान?  
रक्त-रंजित हवा में मौत की गूँज है।  
दबकर, कुचलकर जीवन चिल्ला रहा है,  
शाख से टूटकर गिर रही हैं कोमल पत्तियाँ।  

प्रकृति सब देख रही है,  
वह उत्तर देगी—कल देख लेना।  
पूरी धरती काँप रही है थर-थर,  
यह प्रतिशोध आख़िर किससे है?!  

अब बस करो यह खामोशी,  
भुला दो, क्षमा करो।  
मनन करो—इंसान बनो।  
बहुत मौतें हो चुकीं; अब जागो,  
उन मरते हुए मासूमों की आवाज़ बनो।  

आज ही रोक दो ये युद्ध,  
वरना कल इतिहास तुम पर सवाल उठाएगा।  
अब थम जाने दो इन शोरों को—  
यह दुनिया केवल दो पैरों वालों की नहीं।  

आँखें खोलो दुनिया!  
रोको इन युद्धों को, ऐ इंसान!  

जी आर कवियूर  
28-02-2026  
(टोरंटो, कनाडा)

फिर वही रात याद आई (ग़ज़ल)

 फिर वही रात याद आई (ग़ज़ल)

ठंडी हवाओं में तेरी बात याद आई,
चाँदनी छूते ही हर सौगात याद आई।

खामोशियों में भी थी तेरी ही रागिनी,
वीणा सी दिल में कोई बरसात याद आई।

सूनी सी राहों पे चलते रहे तन्हा,
पग-पग पे तेरी वो मुलाक़ात याद आई।

बीती हुई शामों की खुशबू महक उठी,
भीगी सी आँखों को हर रात याद आई।

सुनसान गली, चाँद धुँधला, धड़कन भारी,
उस पहली हँसी की करामात याद आई।

'जी आर' का दिल आज भी मानता ही नहीं,
साज़ों ने छेड़ा तो हर रात याद आई।

जी आर कवियुर 
26 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)

संभल कर बात कीजिए (ग़ज़ल)

 संभल कर बात कीजिए (ग़ज़ल)


मौसम यहाँ का सर्द है, ठहर कर बात कीजिए  
दिल भी बहुत नाज़ुक है, सोच कर बात कीजिए  

नज़रों में कुछ धुआँ सा है, देख कर बात कीजिए  
शायद कोई ख़्वाब टूटा हो, समझ कर बात कीजिए  

लफ़्ज़ों में आग भी छुपी है, परख कर बात कीजिए  
होठों की हल्की हँसी पर, ठहर कर बात कीजिए  

रिश्तों की डोर काँच सी है, पकड़ कर बात कीजिए  
टूटे तो फिर न जुड़ सकेगी, डर कर बात कीजिए  

माशूका तेरी याद भी है, गरम कर बात कीजिए  
मौसम की इस सर्दी में, सँवर कर बात कीजिए  

दुनिया बड़ी अजीब है ये, बदल कर बात कीजिए  
सच को ज़रा सा प्यार से, ढल कर बात कीजिए  

'जी आर' का दिल भी शीशा है, संभल कर बात कीजिए  
उसकी ख़ामोशी को पहले, समझ कर बात कीजिए

जी आर कवियुर 
26 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)

ढूँढता रहा” (ग़ज़ल)

 ढूँढता रहा” (ग़ज़ल)





ज़िंदगी की ग़ज़ल में मुखड़ा ढूँढता रहा,  
छंद और तुक के बीच अर्थ ढूँढता रहा।  

महफ़िलों की भीड़ में चेहरा बदलता रहा,  
मैं तेरी आँखों में दर्पण ढूँढता रहा।  

दीप की लौ रात भर धीरे-धीरे जलती रही,  
मैं उसी उजाले में पथ ढूँढता रहा।  

शब्द बनते-बिगड़ते रहे मन के आँगन में,  
हर अधूरे भाव में स्पंदन ढूँढता रहा।  

गीत समय की धूल में कहीं दबता ही रहा,  
मैं उसी धूल में अपना सावन ढूँढता रहा।  

"जी आर" अपने ही मन से प्रश्न करता रहा,  
हर पंक्ति में अपना जीवन ढूँढता रहा।

जी आर कवियुर 
25 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)