Tuesday, April 21, 2026
॥ माँ गंगा के चरणों में ॥
Sunday, April 19, 2026
नैनों की प्यास(एक ग़ज़ल)
झील किनारे की निस्तब्धता
संध्या के बादल
बारिशी हवा की लय
तारों की गलियां
पक्षियों का गीत
आंखों की दास्तान (ग़ज़ल)
बारिश के मोती
फूलों का राग
चांदनी के दृश्य
चंपा फूल की सुंदरता**
मधु की मिठास
मिट्टी की खुशबू
नदी की निस्तब्धता
रूठ गई (ग़ज़ल)
अजब सफ़र, सच्चा मोह (ग़ज़ल)
अजब सफ़र, सच्चा मोह (ग़ज़ल)
पत्थरों की भी कहानियाँ
करार है (ग़ज़ल)
दो देशों का संगम
बुझ जाएं। (ग़ज़ल)
Sunday, April 5, 2026
संध्यास्तारक
Friday, April 3, 2026
आशा की किरण
रात्रि का संगीत
हृदय की धड़कन
वृक्ष की पीड़ा
छायादार वृक्ष
दिल में ठहरी बात ( ग़ज़ल)
स्वर्ग और नरक यहीं है (ग़ज़ल)
सफ़र (ग़ज़ल)
यादों का सफ़र। ( ग़ज़ल )
ज्ञान की ज्योति (भक्ति गज़ल)
ज्ञान की ज्योति
(भक्ति गज़ल)
हे माँ सरस्वती, वीणा वादिनी, ज्ञान की ज्योति जगा दो,
मेरे शब्दों में सत्य और प्रेम का मधुर स्वर सजा दो।
अंधेरों से घिरा है मन का कोना, भटक रहा हूँ राहों में,
मिटा के अज्ञान का ये कुहासा, सुगम रास्ता दिखा दो।
जगत की चकाचौंध में न खो जाए कहीं सादगी मेरी,
मेरे अंतर्मन में तू अपनी भक्ति की मूरत बसा दो।
कोई राग ऐसा छेड़ो जो रूह को सुकून दे जाए माँ,
सुरों के संगम से आज मेरा वीरान गुलशन खिला दो।
नहीं मांगता मैं स्वर्ण-मुकुट या वैभव की ये दुनिया,
बस अपनी करुणा का एक कतरा मेरे दामन में गिरा दो।
कलम चले तो सिर्फ हक की बातें लिखे ज़माने के लिए,
मेरी स्याही में तुम अपनी पावनता का अमृत मिला दो।
भटक न जाए राह से कभी 'जी आर' इस स्वार्थ के जग में,
तू अपनी ममता की छाँव में उसे हरदम पनाह दे दो।
जी आर कवियुर
01 04 2026
(कनाडा, टोरंटो)
शिवाभूति
इन पत्थरों की जुबां से ( ग़ज़ल)
“यादों की दुनिया” ( ग़ज़ल )
पत्थरों की भी कहानियाँ
दिव्य प्राण-वायु (शून्य सी बाँसुरी)
नैना (ग़ज़ल)
फूलों की कोमल खुशबू
क़ुदरत से इबारतें ( ग़ज़ल )
दिल की महफिल में (ग़ज़ल)
करार है (ग़ज़ल)
दो देशों का संगम
जीवन की यात्रा
बुझ जाएं। (ग़ज़ल)
Tuesday, March 24, 2026
विज्ञान की रक्षक
महकती है। (ग़ज़ल )
जल की सरगम”
नई नज़र है
निकला है (ग़ज़ल)
झील की संध्या
Tuesday, March 17, 2026
പ്രവാസിയെന്ന കറവപ്പശു ( प्रवासी एक दूहती-गय(ग़ज़ल) जी आर कवियुर Fussion
प्रवासी का जीवन
प्रवासी का जीवन
संघर्षों से भरे हालात, ||
सूरज की किरणों में लहराता भय, ||
अपना देश और घर छोड़कर भटकता, ||
स्वतंत्रता के लिए कटती अनगिनत रातें... ||
नियोक्ताओं द्वारा दिए गए हॉलों में, ||
एक के ऊपर एक रखी बिस्तरों में, ||
मानवों ने अपने सपनों को बिछाया— ||
भाषाएँ अलग, देश अलग, ||
पर सपनों और भय की आवाज़ एक समान... ||
कल तक अपने रिश्तों की ||
बातों का उद्देश्य सिर्फ़ जरूरतें थीं, ||
“कल क्या चाहिए? आज क्या चाहिए?” इस तरह के सवालों में, ||
प्रेम कहीं खो सा गया था... ||
आज— ||
सिर्फ़ घंटियों की आवाज़ ही एक सांत्वना है, ||
“क्या तुम ठीक हो?” ऐसा एक शब्द ||
जिंदगी को थामे रखने वाली डोर की तरह— ||
फिर भी नहीं पूछा जाता... ||
आकाश में गूंजती ||
बारूद की गड़गड़ाहट, ||
पंछियों की नहीं अब ये आवाज़... ||
भय के लोहे के पंख, ||
निद्राहीन रातें... ||
प्रवासी हमेशा वही, ||
परिवार का वह भरोसेमंद, ||
आज अपनी ही जान का रखवाला, ||
कल क्या होगा यह नहीं जानता… ||
उसका हृदय— ||
दो हिस्सों में टूटा हुआ, ||
एक हिस्सा घर में, ||
दूसरा युद्ध की परछाइयों में... ||
अब भी प्रवासी गरीब जीवन में, ||
कपड़े के लिए भी कोई दूसरा नहीं, ||
वापस लौटने पर क्या होगा यह नहीं जानता, ||
उलझते हुए, पलटते हुए, ||
नींद खोई हुई बिस्तर पर लेटा है...
जी आर कवियुर
17 03 2026
(कनाडा , टोरंटो)

















