Friday, April 3, 2026

बुझ जाएं। (ग़ज़ल)

बुझ जाएं। (ग़ज़ल)

समा और क्षमा भी बुझ जाएं,
रोशनी के रंगत में अंधकार बुझ जाएं।

सन्नाटा भी गूँज उठे,
चाँदनी में सब यादें बुझ जाएं।

दिल की राहों में चुप्प रहे,
अहसासों की हर कदर बुझ जाएं।

ख्वाबों के पंख भी टूट जाएं,
हसरतों की गलियों में सब बुझ जाएं।

ग़म की बारिश थम जाए,
आँसुओं की नदियाँ भी बुझ जाएं।

मौन की किताबें खुल जाएं,
क़िस्सों की हर पंक्ति बुझ जाएं।

राह-ए-मोहब्बत में छाँव ढल जाए,
सच्चाई की छवि में भ्रम बुझ जाए।

रात की चादर जब ढक जाए,
सपनों की दुनिया में भी सब बुझ जाएं।

जी आर की कलम से ये अल्फ़ाज़ बुझ जाएं,
हर दिल की गूँज में सिर्फ प्यार बुझ जाएं।

जी आर कवियूर 
25-03-2026
(कनाडा, टोरंटो)

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