इन पत्थरों की जुबां से
( ग़ज़ल)
पत्थरों के पास भी कहने को बातें हैं,
मौन में छुपी अनगिनत यादें हैं।
समय के कदमों ने छुआ जिन राहों को,
उनमें बसतीं गवाही की छायें हैं।
बारिश ने छूकर यादें जगाईं,
धूप ने कठोर लम्हे बनाए हैं।
बिना शब्दों के सच कह जाते,
मौन में अपनी भाषा सुनाते हैं।
रास्तों के किनारे पड़े ये रूप,
यात्राओं के राज़ संभाले हुए हैं।
अनदेखी आँखें भी समझ जाएं,
ये जीवन को चुपचाप लिखे हुए हैं।
हर पल ये पत्थर अपनी कहानी कहते हैं,
हर छायां में जीवन के राज़ पलते हैं।
ये दिल की बातें मैं जी आर कह देता हूँ,
इन पत्थरों की जुबां में मेरी परछाइयाँ साफ़ दिखाई देती हैं।
जी आर कवियुर
30 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)

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