यादों का सफ़र।
( ग़ज़ल )
तेरे इनकार से नहीं रुकता दिल का सफ़र,
मेरी मुरादों में चलता है तेरी यादों का सफ़र।
तेरी ख़ामोशी में छुपा है कोई दर्द-ए-असर,
यूँ ही चलता रहा खामोशियों का सफ़र।
रात भर चाँद भी करता रहा मेरा हमसफ़र,
तेरी यादों में ही कटता रहा हर एक सफ़र।
दिल के वीराने में गूँजती रही तेरी ही नज़र,
किस तरह तय हुआ तन्हाइयों का सफ़र।
तेरे वादों की छाँव आज भी देती है असर,
वरना मुश्किल था यूँ जी लेना ये सफ़र।
हर दुआ में तेरा नाम ही आया बनकर असर,
मेरी रूह ने भी चुना बस तेरा ही सफ़र।
कभी ठहर कर भी देखा नहीं इस दिल ने मगर,
बस चलता ही रहा चाहतों का ये सफ़र।
तेरी राहों में बिछा दी हैं उम्मीदों की डगर,
मेरी धड़कनों ने चुना तेरा ही सफ़र।
‘जी आर’ लिखता रहा दर्द को बनाकर हमसफ़र,
उसकी ग़ज़लों में ही बसता है दिल का सफ़र।
जी आर कवियुर
01 04 2026
(कनाडा , टोरंटो)

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