इस जीवन के तराने में अजब सा मेल हो गया,
तेरी गलियों में भटकता दिल तुझी से मोह हो गया।
कभी सोचा न था ये रास्ता बदल जाएगा,
चलते-चलते देखो मन भी जैसे खो गया।
तू दूर रहकर भी हर पल पास लगता है,
आँखों से ओझल सही, दिल में तू ही हो गया।
समय की धूप में जलते रहे सपने कितने,
तेरी यादों का साया मन को ठंडा कर गया।
पराए देश में कुछ कमी सी हरदम लगी,
तेरी मिट्टी की खुशबू से ही मन पूरा हो गया।
ये आठ महीने जैसे एक लंबी परीक्षा थे,
घर लौटने का सोचते ही मन उजला हो गया।
अब लौटकर आऊँगा अपने उसी आंगन में,
जहाँ हर दुख भी अपनों में हल्का हो गया।
कहता हूँ मैं “जी आर” ये सफर भी अजब कहानी है,
दूर रहकर ही दिल को तुझसे सच्चा मोह हो गया।
जी आर कवियुर
06 04 2026
(कनाडा, टोरंटो)
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