दिल में ठहरी बात ( ग़ज़ल)
बात जब दिल में ही रखी गई,
कहने की चाह में तड़पती रह गई।
तेरी यादों का नूर जब दिल पे उतरा,
हर दुआ उसी में सिमटती रह गई।
रूह ने तुझको ही अपना ख़ुदा समझा,
जिस्म की हर ख्वाहिश भटकती रह गई।
इश्क़ की राह में खुद को मिटाते-मिटाते,
मैं से “हम” की सूरत निखरती रह गई।
तेरी ख़ामोशी में भी एक सदा थी ऐसी,
जो मेरी रग-रग में उतरती रह गई।
दर पे तेरे जो झुकी मेरी ये पेशानी,
हर दुआ वहीं पर ठहरती रह गई।
मैं ‘जी आर’ तेरे दर पे ख़ामोश खड़ा ही रहा,
जो बात थी लबों पर, दिल में ही ठहरती रह गई।
जी आर कवियुर
02 04 2026
(कनाडा , टोरंटो)

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