नदी की निस्तब्धता
बहती नदी शांत सी लगती,
भीतर कोई कथा चलती।
किनारे उसकी बात समझते,
बिन शब्दों के सुन लेते।
पत्थरों के बीच राह बनाकर,
आगे बढ़ती रहती है।
गहराई में छिपी एक ध्वनि,
दिल ही उसे सुन पाता।
नदी की यह मौन यात्रा,
जीवन को राह दिखाती।
जैसे शांति की शक्ति होती,
मन सुकून को खोजता।
जी आर कवियुर
13 04 2026
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