Friday, April 3, 2026

दिल की महफिल में (ग़ज़ल)

 दिल की महफिल में (ग़ज़ल)




जी आर अब समझा कि दुनिया बड़ी है,
मेरे ही अंदर मगर एक दुनिया खड़ी है।

खामोश लम्हों में कुछ राज़ मिलते,
भीड़ के अंदर भी तन्हाई पड़ी है।

मैं ढूंढता रहा खुद को हर इक चेहरे में,
आईना बोला कि सच्चाई यहीं है।

आदमी हूँ मगर अदमी हूँ, यह मैं नहीं जानता,
आदत मेरी बुरी है, इंसान बनने को नहीं चाहता है।

वो जो मिले थे बड़े नाम लेकर,
उनसे भी गहरी मेरी ये कमी है।

सफ़र में सीखा न ऊँचा हूँ न नीचा,
बस सोच की अपनी ही एक सीढ़ी है।

हर शख्स अपने ही किस्सों में खोया,
दुनिया से ज्यादा ये अंदर की गली है।

ख्वाबों में भी कुछ सीखते रहे हम,
सफर में मिली हर सुबह की झड़ी है।

जी आर अब समझा कि दुनिया बड़ी है,
उसकी ही आवाज़ सबसे शांत है। 

जी आर कवियुर 
 27 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)

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