दिव्य प्राण-वायु (शून्य सी बाँसुरी)
इस शून्य सी बाँसुरी में - अपनी
प्राण-वायु भर दो तुम...
इससे बहती हर रागिनी में - मेरा
आत्म-भाव भर दो तुम...
जब 'मैं' का भाव मिट जाता है
तब तेरा नाद जाग उठता है...
उंगलियों से रचे इस विस्मय में - तेरा
विश्व सारा समा जाता है...
अनजान राहों में सहारा बनके
ज्ञान बनकर मुझमें उतरना तुम...
बिना रुके गाऊँ इन गीतों में - सदा
ईश्वरीय चैतन्य जगाना तुम...
इस शून्य सी बाँसुरी में - अपनी
प्राण-वायु भर दो तुम...
इससे बहती हर रागिनी में - मेरा
आत्म-भाव भर दो तुम...
जी आर कवियूर
29-03-2026
(कनाडा, टोरंटो)

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