Sunday, April 19, 2026

रूठ गई (ग़ज़ल)

रूठ गई (ग़ज़ल)

आँखें चार हुईं, जब जवानी रूठ गई  
हाय उस बुढ़ापे के चाँद जो खिले, रूठ गई

सपनों के बाग़ में भी अब खुशबू रूठ गई  
फूलों की महक कहीं हवाओं में रूठ गई

हँसी थी जो चेहरे पर, वो झील सी रूठ गई  
दिल के अंदर की चमक अब नींदों में रूठ गई

यादों की गलियों में कदम मेरे थक गए  
अधूरी दास्तां सब ग़ज़लों में रूठ गई

मुसाफिर थे जो साथ चले, वो राहों में रूठ गए  
कदमों की आवाज़ भी अब हवाओं में रूठ गई

आँसू जो बहते थे रात की तनहाई में  
उनकी भी नमी अब तक़दीर में रूठ गई

वक़्त की धार ने तोड़ी रिश्तों की डोर  
सपनों के मेले की भी रौनक रूठ गई

इश्क़ की खुशबू अब तक़दीर की किताब में  
ग़ज़लों की गली में अकेली रूठ गई

मैं जी आर, कहूँ तुम्हें दिल की बात यही  
हमारी हसरतों की हर खुशबू रूठ गई

जी आर कवियुर 
06 04 2026
(कनाडा, टोरंटो)

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