संध्याकाल का आकाश नीले रंग में निहारता है,
सितारे यादों में पलट कर झांकते हैं।
पंछी लौटते हैं अपने आशियाने की ओर,
हवा ठंडक की सुगंध फैलाती है चारों ओर।
रास्ते धीरे-धीरे मंद प्रकाश में चमकते हैं,
अनजाने दिल दृश्य की तलाश में रहते हैं।
पगडंडियों पर गिरी आँखों में,
सवेरे की परछाई चमकती है।
सूरज की गर्म यादें,
संध्या के मधुर स्पर्श में विलीन होती हैं।
मौन की धुन में एक स्वर उठता है,
हृदय तक पहुँचती है उम्मीद की रोशनी।
जी आर कवियुर
30 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)
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