Friday, April 3, 2026

वृक्ष की पीड़ा

वृक्ष की पीड़ा

धरती के सीने पर खड़ा एक जीवन,
जड़ों में छुपी अनगिनत स्मृतियाँ।
हवा के स्पर्श से काँपते पत्ते,
बिन कहे ही दर्द बयां करते।

धूप में थकी हुई शाखाएँ,
बारिश में सुकून तलाशती हैं।
समय के स्पर्श से बने पल,
मौन में कहीं बस जाते हैं।

तन में छुपे घाव गहरे,
जीवन का भार सहते रहते।
सब कुछ देकर कुछ न माँगे,
छाया बनकर जग को ढाँपे।

जी आर कवियुर 
03 04 2026
(कनाडा, टोरंटो)

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