ज्ञान की ज्योति
(भक्ति गज़ल)
हे माँ सरस्वती, वीणा वादिनी, ज्ञान की ज्योति जगा दो,
मेरे शब्दों में सत्य और प्रेम का मधुर स्वर सजा दो।
अंधेरों से घिरा है मन का कोना, भटक रहा हूँ राहों में,
मिटा के अज्ञान का ये कुहासा, सुगम रास्ता दिखा दो।
जगत की चकाचौंध में न खो जाए कहीं सादगी मेरी,
मेरे अंतर्मन में तू अपनी भक्ति की मूरत बसा दो।
कोई राग ऐसा छेड़ो जो रूह को सुकून दे जाए माँ,
सुरों के संगम से आज मेरा वीरान गुलशन खिला दो।
नहीं मांगता मैं स्वर्ण-मुकुट या वैभव की ये दुनिया,
बस अपनी करुणा का एक कतरा मेरे दामन में गिरा दो।
कलम चले तो सिर्फ हक की बातें लिखे ज़माने के लिए,
मेरी स्याही में तुम अपनी पावनता का अमृत मिला दो।
भटक न जाए राह से कभी 'जी आर' इस स्वार्थ के जग में,
तू अपनी ममता की छाँव में उसे हरदम पनाह दे दो।
जी आर कवियुर
01 04 2026
(कनाडा, टोरंटो)

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