Tuesday, April 21, 2026
॥ माँ गंगा के चरणों में ॥
॥ माँ गंगा के चरणों में ॥
शिव की जटा से निकली धारा, पावन रूप तुम्हारा है,
पतित-पावनी हे माँ गंगे, तू ही जग का सहारा है।
वैशाख शुक्ल की सप्तमी को, धरा पर जो तुम आई हो,
अमृतमयी शीतल जल से, खुशियाँ साथ तुम लाई हो।
जह्नु ऋषि की तुम पुत्री हो, 'जाह्नवी' नाम तुम्हारा है,
पाप मिटाती हर प्राणी का, निर्मल प्रवाह तुम्हारा है।
पुण्य उदय होते हैं माँ, तेरे पावन एक दर्शन से,
जीवन सफल हो जाता है, श्रद्धापूर्ण आचमन से।
दीप दान की अनुपम शोभा, तट पर छटा निराली है,
आरती की पावन ध्वनि से, मन में छाई लाली है।
जन-जन की तुम तारिणी माता, नमन तुम्हें शत-बार करें,
भक्ति तुम्हारी हृदय में भरके, हम भवसागर पार करें।
जी आर कवियुर
22 04 2026
तिरुवल्ला कवियुर
Sunday, April 19, 2026
नैनों की प्यास(एक ग़ज़ल)
नैनों की प्यास
(एक ग़ज़ल)
ये नैना काजल बिना तरसें,
तेरी दीद की आस में तरसें।
तेरे ख़्वाब दिल के क़रीब आएँ,
मगर छूने की प्यास में तरसें।
तेरी याद की चाँदनी उतरे,
हम अंधेरी हर रात में तरसें।
लबों पे तेरा ही नाम आए,
मगर कहने की बात में तरसें।
तू पास होकर भी दूर जैसे,
हम तेरे ही एहसास में तरसें।
ये दिल तेरे इश्क़ में डूबा,
किसी और जज़्बात में तरसें।
नज़रें बिछाए बैठे हैं हम,
तेरे आने की राह में तरसें।
'जी आर' भी अब यही कहे है,
तेरी एक मुलाक़ात में तरसें।
जी आर कवियुर
20 04 2026
झील किनारे की निस्तब्धता
झील किनारे की निस्तब्धता
झील किनारे शांति फैलती,
जल दर्पण सा स्थिर दिखता।
जब हवा हल्के से छू जाती,
लहरें धीरे-धीरे चलतीं।
दूर कहीं नाव की परछाईं,
खामोशी में कथा लिखती।
पत्तों की शांत सी हलचल में,
प्रकृति सुकून देती है।
आकाश जल में झलक दिखाए,
दो दुनिया एक हो जातीं।
इन शांत पलों के भीतर,
दिल को सुकून मिल जाता।
जी आर कवियुर
19 04 2026
(तिरुवल्ला ,कवियुर )
संध्या के बादल
संध्या के बादल
संध्या में बादल रंग बदलते,
आकाश चित्र सा बन जाता।
लाल और सुनहरे रंग मिलकर,
एक सुंदर दृश्य रच जाते।
धीरे-धीरे चलती आकृतियां,
सपनों जैसी लगती हैं।
सूर्य के विदा होते क्षण में,
रोशनी छाया में खो जाती।
इन बादलों की यात्रा में,
समय शांत बहता जाता।
इस संध्या की सुंदरता में,
हृदय को शांति मिल जाती।
जी आर कवियुर
19 04 2026
(तिरुवल्ला ,कवियुर )
बारिशी हवा की लय
बारिशी हवा की लय
बरसाती हवा की लय में,
पत्ते धीरे-धीरे हिलते।
जब बूंदें साथ मिलतीं,
एक मधुर धुन बनती।
ठंडी छुअन गुजरती जाए,
मन शांति में बहता है।
भीगी राहें चमक उठतीं,
रोशनी चारों ओर नाचे।
जब दोनों का संगम होता,
प्रकृति गीत बन जाती।
इस मधुर लय के भीतर,
जीवन खिल उठता है।
जी आर कवियुर
19 04 2026
(तिरुवल्ला ,कवियुर )
तारों की गलियां
तारों की गलियां
आकाश की राहों में तारे चमकते,
रात अपनी सुंदरता दिखाती।
छोटी-छोटी रोशनियां मिलकर,
अनंत कथा सुनाती जातीं।
इस खामोश आकाश में,
मन दूर तक चला जाता।
हर चमक एक सपना बनकर,
जीवन को भर देता।
गलियों जैसे फैले तारे,
एक अद्भुत संसार रचते।
जब आंखें उन्हें निहारतीं,
दिल में खुशी भर जाती।
जी आर कवियुर
19 04 2026
(तिरुवल्ला ,कवियुर )
पक्षियों का गीत
पक्षियों का गीत
जब सुबह पक्षी गाते,
दुनिया नई जाग उठती।
पंख फैलाकर उड़ते क्षण में,
स्वतंत्रता गीत बन जाती।
पेड़ों की शाखों से,
मधुर स्वर बहते आते।
हवा के संग मिलकर,
दिल को छू जाते हैं।
इन छोटे जीवों का गान,
बड़ी खुशी दे जाता।
प्रकृति के इस संगीत में,
जीवन उजाला पाता।
जी आर कवियुर
19 04 2026
(तिरुवल्ला ,कवियुर )
आंखों की दास्तान (ग़ज़ल)
आंखों की दास्तान (ग़ज़ल)
आंखों में नमी, दिल में प्यार है
आहों की ये दास्तान भी प्यार है
तन्हाइयों का सिलसिला बरक़रार है
हर एक ख़्वाब अब भी तेरा इंतज़ार है
दिल की सदा में छुपा इकरार है
खामोश लफ़्ज़ों में भी असरदार है
रातों की चादर में तेरा ही ख़ुमार है
चांदनी भी जैसे तेरा किरदार है
यादों का हर लम्हा दिल पे सवार है
बीता हुआ हर पल भी क़रार है
रूह में बसा तेरा ही निखार है
मेरे हर जज़्बात पे तेरा अधिकार है
‘जी आर’ के लफ़्ज़ों में बस तेरा ही प्यार है
इस दिल की हर धड़कन तेरा ही इकरार है
जी आर कवियुर
16 04 2026
(तिरुवल्ला,कवियुर)
बारिश के मोती
बारिश के मोती
जब बूंदें मोती बनकर गिरतीं,
धरती खुशी से मुस्काती।
पत्तों पर ठहरकर चमकतीं,
आंखों को ठंडक देतीं।
हर छोटी सी गिरती बूंद,
जीवन में नई ताजगी लाए।
भीगी राहें चमक उठतीं,
रोशनी पानी में खेले।
इन बारिश के मोतियों में,
खुशी छुपी रहती है।
प्रकृति के इस खेल में,
मन आनंद पा लेता है।
जी आर कवियुर
13 04 2026
फूलों का राग
फूलों का राग
फूलों से भरे बगीचे में,
रंग मिलकर गीत बनाते।
जब खुशबू चारों ओर फैले,
मन संगीत सुन पाता।
पंख वाले जीव उड़ते फिरें,
खुशी हर ओर बिखेरते।
जब पंखुड़ियां खुलतीं धीरे,
जीवन नया सा लगता।
प्रकृति का यह मधुर राग,
दिल की धड़कन से मिलता।
फूलों की इस दुनिया में,
सुंदरता बसती रहती।
जी आर कवियुर
13 04 2026
चांदनी के दृश्य
चांदनी के दृश्य
जब चांदनी धीरे उतरती,
दुनिया चांदी सी चमकती।
राहों पर उजाला फैलता,
परछाइयां लंबी चलतीं।
रात की खामोशी में,
मन सपनों में खो जाता।
आकाश में चमकता चांद,
आशा का दीप बन जाता।
इन चांदनी के दृश्यों में,
शांति भरी दुनिया दिखती।
मन की गहराइयों में भी,
रोशनी जगमग करती।
जी आर कवियुर
13 04 2026
चंपा फूल की सुंदरता**
चंपा फूल की सुंदरता**
चंपा का कोमल सा मुस्कान,
आंखों में सुंदरता भर दे।
जब उसकी खुशबू फैलती,
मन में खुशी खिल जाती।
उसका सुनहरा रंग दमके,
जैसे प्रकृति सजी हो सुंदर।
मधुमक्खियां चारों ओर नाचें,
जीवन गीत बन जाता।
छोटे से इस फूल की उपस्थिति,
बड़ी सुंदरता दे जाती।
चंपा की इस मोहकता में,
दिल मिठास से भर जाता।
जी आर कवियुर
13 04 2026
मधु की मिठास
मधु की मिठास
फूलों से निकला एक रस,
मधुमक्खियां उसे संजोतीं।
मौन परिश्रम का यह फल,
स्वाद में खुशी भर देता।
प्रकृति का यह सुंदर उपहार,
कोमल और मधुर रस।
छोटी सी बूंद में भी,
मिठास का संसार छिपा।
जीवन की खुशियों जैसा,
धीरे-धीरे मन में घुले।
इस सरल मधु के भीतर,
प्रेम की ध्वनि सुनाई दे।
जी आर कवियुर
13 04 2026
मिट्टी की खुशबू
मिट्टी की खुशबू
जब बूंदें धरती को छूतीं,
नमी की खुशबू उठती है।
जैसे नया जीवन जन्म ले,
प्रकृति आनंद बिखेरती है।
खेतों में हरियाली छा जाए,
आंखों को ठंडक देती है।
हवा में फैली यह सुगंध,
दिल को स्नेह से भर देती।
यादों को फिर से जगा देती,
बीता समय लौटा लाती।
धरती का यह सुंदर उपहार,
जीवन में शांति भर देता।
जी आर कवियुर
13 04 2026
नदी की निस्तब्धता
नदी की निस्तब्धता
बहती नदी शांत सी लगती,
भीतर कोई कथा चलती।
किनारे उसकी बात समझते,
बिन शब्दों के सुन लेते।
पत्थरों के बीच राह बनाकर,
आगे बढ़ती रहती है।
गहराई में छिपी एक ध्वनि,
दिल ही उसे सुन पाता।
नदी की यह मौन यात्रा,
जीवन को राह दिखाती।
जैसे शांति की शक्ति होती,
मन सुकून को खोजता।
जी आर कवियुर
13 04 2026
रूठ गई (ग़ज़ल)
रूठ गई (ग़ज़ल)
आँखें चार हुईं, जब जवानी रूठ गई
हाय उस बुढ़ापे के चाँद जो खिले, रूठ गई
सपनों के बाग़ में भी अब खुशबू रूठ गई
फूलों की महक कहीं हवाओं में रूठ गई
हँसी थी जो चेहरे पर, वो झील सी रूठ गई
दिल के अंदर की चमक अब नींदों में रूठ गई
यादों की गलियों में कदम मेरे थक गए
अधूरी दास्तां सब ग़ज़लों में रूठ गई
मुसाफिर थे जो साथ चले, वो राहों में रूठ गए
कदमों की आवाज़ भी अब हवाओं में रूठ गई
आँसू जो बहते थे रात की तनहाई में
उनकी भी नमी अब तक़दीर में रूठ गई
वक़्त की धार ने तोड़ी रिश्तों की डोर
सपनों के मेले की भी रौनक रूठ गई
इश्क़ की खुशबू अब तक़दीर की किताब में
ग़ज़लों की गली में अकेली रूठ गई
मैं जी आर, कहूँ तुम्हें दिल की बात यही
हमारी हसरतों की हर खुशबू रूठ गई
जी आर कवियुर
06 04 2026
(कनाडा, टोरंटो)
अजब सफ़र, सच्चा मोह (ग़ज़ल)
अजब सफ़र, सच्चा मोह (ग़ज़ल)
इस जीवन के तराने में अजब सा मेल हो गया,
तेरी गलियों में भटकता दिल तुझी से मोह हो गया।
कभी सोचा न था ये रास्ता बदल जाएगा,
चलते-चलते देखो मन भी जैसे खो गया।
तू दूर रहकर भी हर पल पास लगता है,
आँखों से ओझल सही, दिल में तू ही हो गया।
समय की धूप में जलते रहे सपने कितने,
तेरी यादों का साया मन को ठंडा कर गया।
पराए देश में कुछ कमी सी हरदम लगी,
तेरी मिट्टी की खुशबू से ही मन पूरा हो गया।
ये आठ महीने जैसे एक लंबी परीक्षा थे,
घर लौटने का सोचते ही मन उजला हो गया।
अब लौटकर आऊँगा अपने उसी आंगन में,
जहाँ हर दुख भी अपनों में हल्का हो गया।
कहता हूँ मैं “जी आर” ये सफर भी अजब कहानी है,
दूर रहकर ही दिल को तुझसे सच्चा मोह हो गया।
जी आर कवियुर
06 04 2026
(कनाडा, टोरंटो)
Raga Puriya Dhanashree
Fusion Gazhal
अजब सफ़र, सच्चा मोह (ग़ज़ल)
വേറിട്ട യാത്ര, സത്യമായ മോഹങ്ങൾ ( ഗസൽ)
इस जीवन के तराने में अजब सा मेल हो गया,
तेरी गलियों में भटकता दिल तुझी से मोह हो गया।
ഈ ജീവിത തരംഗങ്ങളിലെ അസാധാരണമാം മോഹങ്ങൾ,
നിന്റെ വീഥികളിൽ തിരഞ്ഞു ഹൃദയം ആ സത്യപ്രണയത്തിന് മോഹങ്ങൾ
तू दूर रहकर भी हर पल पास लगता है,
आँखों से ओझल सही, दिल में तू ही हो गया।
അകലെ ആയിട്ടും നീ എല്ലായ്പ്പോഴും നിൻ സാമീപ്യം തോന്നുന്നു,
മിഴികളിൽ കാണാനില്ലെങ്കിലും മൊഴികളിൽ നീ മാത്രം ഹൃദയ മോഹങ്ങൾ.
समय की धूप में जलते रहे सपने कितने,
तेरी यादों का साया मन को ठंडा कर गया।
കാലത്തിന്റെ ചൂടിൽ പല സ്വപ്നങ്ങളും കരഞ്ഞു പോയി,
നിന്റെ ഓർമ്മകളുടെ നിഴൽ മനസ്സിനെ ശാന്തമാക്കി ഹൃദയ മോഹങ്ങൾ.
पराए देश में कुछ कमी सी हरदम लगी,
तेरी मिट्टी की खुशबू से ही मन पूरा हो गया।
ഏഴു കടലിനുമിപ്പുറത്ത് ആയിരുന്നാലും ചിലത് അപൂർണ്ണമായി തോന്നിയേക്കാം,
നിന്റെ മണ്ണിന്റെ സുഗന്ധം മനസ്സിൽ നിറയുന്നു ഹൃദയ മോഹങ്ങൾ.
अब लौटकर आऊँगा अपने उसी आंगन में,
जहाँ हर दुख भी अपनों में हल्का हो गया।
ഇനി തിരികെ വന്നീടും അതേ അങ്കണത്തിൽ
അവിടെ എത്തുമ്പോൾ വിഷമങ്ങൾ
കുറയുമല്ലോ ഹൃദയ മോഹങ്ങൾ
कहता हूँ मैं “जी आर” ये सफर भी अजब कहानी है,
दूर रहकर ही दिल को तुझसे सच्चा मोह हो गया।
ജീ ആർ എന്ന എൻ്റെ യാത്ര ഇപ്പോഴും
കഥയായി തുടരുന്നു
ദൂരെ എങ്കിലും നിറയുന്നു ഹൃദയത്തിൽ നിനക്കായുള്ള മോഹങ്ങൾ
जी आर कवियुर / ജീ ആർ കവിയൂർ
06 04 2026
(कनाडा, टोरंटो) / (കാനഡ, ടൊറൻ്റോ)
अजब सफ़र, सच्चा मोह (ग़ज़ल)
अजब सफ़र, सच्चा मोह (ग़ज़ल)
इस जीवन के तराने में अजब सा मेल हो गया,
तेरी गलियों में भटकता दिल तुझी से मोह हो गया।
कभी सोचा न था ये रास्ता बदल जाएगा,
चलते-चलते देखो मन भी जैसे खो गया।
तू दूर रहकर भी हर पल पास लगता है,
आँखों से ओझल सही, दिल में तू ही हो गया।
समय की धूप में जलते रहे सपने कितने,
तेरी यादों का साया मन को ठंडा कर गया।
पराए देश में कुछ कमी सी हरदम लगी,
तेरी मिट्टी की खुशबू से ही मन पूरा हो गया।
ये आठ महीने जैसे एक लंबी परीक्षा थे,
घर लौटने का सोचते ही मन उजला हो गया।
अब लौटकर आऊँगा अपने उसी आंगन में,
जहाँ हर दुख भी अपनों में हल्का हो गया।
कहता हूँ मैं “जी आर” ये सफर भी अजब कहानी है,
दूर रहकर ही दिल को तुझसे सच्चा मोह हो गया।
जी आर कवियुर
06 04 2026
(कनाडा, टोरंटो)
पत्थरों की भी कहानियाँ
पत्थरों की भी कहानियाँ
पत्थरों के पास भी कहने को बातें हैं,
मौन में छुपी अनगिनत यादें हैं।
समय के कदमों ने छुआ जिन राहों को,
उनमें बसतीं गवाही की छायें हैं।
बारिश ने छूकर यादें जगाईं,
धूप ने कठोर लम्हे बनाए।
बिना शब्दों के सच कह जाते,
मौन में अपनी भाषा सुनाते।
रास्तों के किनारे पड़े ये रूप,
यात्राओं के राज़ संभाले हुए।
अनदेखी आँखें भी समझ जाएं,
ये जीवन को चुपचाप लिखे हुए।
जी आर कवियुर
30 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)
करार है (ग़ज़ल)
करार है (ग़ज़ल)
दिल को भी ज़ुबाँ मिली — बीती यादों का करार है,
लम्हों में सदियों का सफ़र, आज भी करार है।
तेरी ख़ामोश नज़र में छुपा कैसा इकरार है,
बिन कहे जो दिल समझे, वही सच्चा करार है।
रात भर जागती आँखों को तेरा इंतज़ार है,
चाँदनी भी थम गई — जैसे उसको करार है।
तेरी बातों में अजीब सा कोई ऐतबार है,
झूठ भी सच लगे दिल को — ये कैसा करार है।
तेरी यादों का नशा दिल पे ऐसा ख़ुमार है,
होश में रह के भी जैसे कोई बेकरार है।
ज़िंदगी के हर मोड़ पे तेरा ही शिकार है,
दिल ये मासूम सा फिर भी उसी पे करार है।
दर्द को मुस्कुरा के हमने यूँ ही गुज़ार है,
हर खुशी के पीछे जैसे छुपा सा करार है।
'जी आर' हमने दर्द को लफ़्ज़ों में ढाल कर कह दिया,
जो भी सुन ले एक दफ़ा — उम्र भर करार है।
जी आर कवियुर
26 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)
दो देशों का संगम
दो देशों का संगम
कनाडा की बर्फ और मेपल की लाली,
सीएन टावर की वो ऊँचाई निराली।
पिज़्ज़ा का स्वाद और झील का किनारा,
यादों में बस गया है ये शहर हमारा।
नारियल के पेड़ और बहती नदियाँ,
डोसा-सांभर की महकती गलियाँ।
केरल की हरियाली में अब हम आए,
दोनों पोतों को गले से लगाए।
दो देशों का मेल, एक प्यारा संगम,
खुशियों की गूँज और दूर हुए गम।
प्यार का धागा सबको जोड़ता है,
नया कल मुस्कुराहटें बटोरता है।
जी आर कवियुर
26 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)
बुझ जाएं। (ग़ज़ल)
बुझ जाएं। (ग़ज़ल)
समा और क्षमा भी बुझ जाएं,
रोशनी के रंगत में अंधकार बुझ जाएं।
सन्नाटा भी गूँज उठे,
चाँदनी में सब यादें बुझ जाएं।
दिल की राहों में चुप्प रहे,
अहसासों की हर कदर बुझ जाएं।
ख्वाबों के पंख भी टूट जाएं,
हसरतों की गलियों में सब बुझ जाएं।
ग़म की बारिश थम जाए,
आँसुओं की नदियाँ भी बुझ जाएं।
मौन की किताबें खुल जाएं,
क़िस्सों की हर पंक्ति बुझ जाएं।
राह-ए-मोहब्बत में छाँव ढल जाए,
सच्चाई की छवि में भ्रम बुझ जाए।
रात की चादर जब ढक जाए,
सपनों की दुनिया में भी सब बुझ जाएं।
जी आर की कलम से ये अल्फ़ाज़ बुझ जाएं,
हर दिल की गूँज में सिर्फ प्यार बुझ जाएं।
जी आर कवियूर
25-03-2026
(कनाडा, टोरंटो)
Sunday, April 5, 2026
संध्यास्तारक
संध्यास्तारक
संध्याकाल का आकाश नीले रंग में निहारता है,
सितारे यादों में पलट कर झांकते हैं।
पंछी लौटते हैं अपने आशियाने की ओर,
हवा ठंडक की सुगंध फैलाती है चारों ओर।
रास्ते धीरे-धीरे मंद प्रकाश में चमकते हैं,
अनजाने दिल दृश्य की तलाश में रहते हैं।
पगडंडियों पर गिरी आँखों में,
सवेरे की परछाई चमकती है।
सूरज की गर्म यादें,
संध्या के मधुर स्पर्श में विलीन होती हैं।
मौन की धुन में एक स्वर उठता है,
हृदय तक पहुँचती है उम्मीद की रोशनी।
जी आर कवियुर
30 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)
Friday, April 3, 2026
आशा की किरण
आशा की किरण
जहाँ अंधकार ने सब घेरा,
एक किरण ने आँखें रोशन किया।
आशा के मृदु स्पर्श में,
हृदय का भय धीरे-धीरे पिघल गया।
उभरते सूरज की किरणें फैलती हैं,
धरती और बारिश मिलकर प्रतिबिंब बनाती हैं।
स्मृतियाँ फिर से जीवित होती हैं,
समय की चादर में छुपा प्यार लौटता है।
जो खो गया, उससे पाठ सीखा गया,
आँखों में बड़े सपने चमकते हैं।
एक निश्चय जो कभी नहीं मिटता,
जीवन की अनंत यात्रा बुलाती है।
जी आर कवियुर
03 04 2026
(कनाडा, टोरंटो)
रात्रि का संगीत
रात्रि का संगीत
मौन से ढकी हुई वन में एक स्वर,
चाँद को मन में रोशन करता संगीत।
हल्की हवा में हृदय की धड़कन,
सितारों की छाया में लय बुनती।
गिरी हुई ओस की बूँदों में प्रतिबिंब,
रात की मधुर धुन में छुपा हुआ।
यादों के पंखों पर उड़ती मौन लय,
प्रकृति का संगीत हृदय को बुलाता।
रात्रि के जादू में विचार बहते,
प्रेम, दर्द, आशा का गान फैलते।
मौन में भी संगीत फैलता,
आसमान और हृदय दोनों को एक साथ बुलाता।
जी आर कवियुर
03 04 2026
(कनाडा, टोरंटो)
हृदय की धड़कन
हृदय की धड़कन
मौन के बीच गूंजता एक तान,
जीवन की पहचान बनता हर क्षण।
अनजाने ही हर पल में,
अंदर की दुनिया दिखलाता मन।
खुशी के पंखों पर उड़ता स्वर,
दर्द की छाया में धीमा पड़ता।
हर धड़कन में भावनाएँ भरतीं,
अनंत बहतीं, रुकती न रहतीं।
प्रेम के स्पर्श से तेज़ हो जाए,
यादों में बसकर जीवित रह जाए।
यह नाद जो कभी न थमता,
जीवन का सत्य सदा कहता।
जी आर कवियुर
03 04 2026
(कनाडा, टोरंटो)
वृक्ष की पीड़ा
वृक्ष की पीड़ा
धरती के सीने पर खड़ा एक जीवन,
जड़ों में छुपी अनगिनत स्मृतियाँ।
हवा के स्पर्श से काँपते पत्ते,
बिन कहे ही दर्द बयां करते।
धूप में थकी हुई शाखाएँ,
बारिश में सुकून तलाशती हैं।
समय के स्पर्श से बने पल,
मौन में कहीं बस जाते हैं।
तन में छुपे घाव गहरे,
जीवन का भार सहते रहते।
सब कुछ देकर कुछ न माँगे,
छाया बनकर जग को ढाँपे।
जी आर कवियुर
03 04 2026
(कनाडा, टोरंटो)
छायादार वृक्ष
छायादार वृक्ष
धूप भरे रास्तों पर छाया फैलती जाए,
डालियों में शांति धीरे-धीरे मुस्काए।
थके हुए मन को सुकून मिल जाता है,
छाया का मार्ग सपनों को सहलाता है।
पत्तों की हलचल कहानी सुनाए,
हवा का संगीत चारों ओर छाए।
जड़ों में सोई बीते समय की यादें,
शाखों में बनकर मुस्कान जगमगाए।
पंछियों का गीत सवेरा बुलाए,
मौन में भी जीवन झलक दिखाए।
छाया देने वाले ये वृक्ष सिखाते,
देने में ही सच्ची खुशी मिल जाती।
जी आर कवियुर
30 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)
दिल में ठहरी बात ( ग़ज़ल)
दिल में ठहरी बात ( ग़ज़ल)
बात जब दिल में ही रखी गई,
कहने की चाह में तड़पती रह गई।
तेरी यादों का नूर जब दिल पे उतरा,
हर दुआ उसी में सिमटती रह गई।
रूह ने तुझको ही अपना ख़ुदा समझा,
जिस्म की हर ख्वाहिश भटकती रह गई।
इश्क़ की राह में खुद को मिटाते-मिटाते,
मैं से “हम” की सूरत निखरती रह गई।
तेरी ख़ामोशी में भी एक सदा थी ऐसी,
जो मेरी रग-रग में उतरती रह गई।
दर पे तेरे जो झुकी मेरी ये पेशानी,
हर दुआ वहीं पर ठहरती रह गई।
मैं ‘जी आर’ तेरे दर पे ख़ामोश खड़ा ही रहा,
जो बात थी लबों पर, दिल में ही ठहरती रह गई।
जी आर कवियुर
02 04 2026
(कनाडा , टोरंटो)
स्वर्ग और नरक यहीं है (ग़ज़ल)
स्वर्ग और नरक यहीं है
(ग़ज़ल)
सजन रे समझो कि स्वर्ग और नरक यहीं है,
सजन रे समझो कि स्वर्ग और नरक यहीं है।
स्नेह से व्यवहार करो, स्वर्ग सजा लो यहीं है,
कटु वचन बोलो अगर, नरक बना लो यहीं है।
महल चौबारे, धन-दौलत सब यहीं रह जाएंगे,
खुदा ने जो जीवन दिया, उसका हिसाब यहीं है।
भला करोगे तो भला ही लौट कर आएगा,
बुरा करोगे तो बुराई का जवाब यहीं है।
किस्से ये पुराने हैं, दुनिया कहती आई,
लड़केपन से बुढ़ापे तक हर ख्वाब यहीं है।
सच की राह पे चलो, वही रौशनी दिखाएगी,
झूठ के अंधेरों में हर इक नक़ाब यहीं है।
हर एक रूह में वही एक नूर समाया है,
अलग दिखते हैं मगर सबका जनाब यहीं है।
यक़ीं रखो तो दिल से दिल का रास्ता बनता है,
एक-एक में खुदा है, सबका हिसाब यहीं है।
प्रेम सच्चा हो तो वक्त भी झुक जाता है,
ये प्रेम नश्वर नहीं, इसका उजास यहीं है।
“जी आर” ये महसूस कर कहता है दिल से आज,
इंसान के कर्मों में ही स्वर्ग और नरक यहीं है।
जी आर कवियुर
31 03 2026
(कनाडा , टोरंटो)
सफ़र (ग़ज़ल)
सफ़र (ग़ज़ल)
ये ज़िन्दगी भी क्या है, बस एक लम्बा सफ़र,
कहीं रुकता नहीं है, ये यादों का सफ़र।
कभी धूप मिली तेज़, कभी ठंडी छाँव मिली,
हर मोड़ पर नया है, ये अपनों का सफ़र।
सफेद बालों ने लिख दी है कहानी अपनी,
चेहरे पर दिखता है, उम्र भर का सफ़र।
पुरानी यादों की गठरी है साथ मेरे,
आँखों में बसता है, ख़्वाबों का सफ़र।
थक कर भी जो कभी रुकता नहीं है,
वही जानता है, इस रूह का सफ़र।
बाल सफेद हो गए, चेहरे पर रेखाएँ आईं,
बताती हैं ये सब, तजुर्बों का सफ़र।
‘जी आर’ लिखता रहा, दिल की हर बात को,
शायरी में ही छुपा है, मेरी रूह का सफ़र।
जी आर कवियूर
01 04 2026
(कनाडा , टोरंटो)
यादों का सफ़र। ( ग़ज़ल )
यादों का सफ़र।
( ग़ज़ल )
तेरे इनकार से नहीं रुकता दिल का सफ़र,
मेरी मुरादों में चलता है तेरी यादों का सफ़र।
तेरी ख़ामोशी में छुपा है कोई दर्द-ए-असर,
यूँ ही चलता रहा खामोशियों का सफ़र।
रात भर चाँद भी करता रहा मेरा हमसफ़र,
तेरी यादों में ही कटता रहा हर एक सफ़र।
दिल के वीराने में गूँजती रही तेरी ही नज़र,
किस तरह तय हुआ तन्हाइयों का सफ़र।
तेरे वादों की छाँव आज भी देती है असर,
वरना मुश्किल था यूँ जी लेना ये सफ़र।
हर दुआ में तेरा नाम ही आया बनकर असर,
मेरी रूह ने भी चुना बस तेरा ही सफ़र।
कभी ठहर कर भी देखा नहीं इस दिल ने मगर,
बस चलता ही रहा चाहतों का ये सफ़र।
तेरी राहों में बिछा दी हैं उम्मीदों की डगर,
मेरी धड़कनों ने चुना तेरा ही सफ़र।
‘जी आर’ लिखता रहा दर्द को बनाकर हमसफ़र,
उसकी ग़ज़लों में ही बसता है दिल का सफ़र।
जी आर कवियुर
01 04 2026
(कनाडा , टोरंटो)
ज्ञान की ज्योति (भक्ति गज़ल)
ज्ञान की ज्योति
(भक्ति गज़ल)
हे माँ सरस्वती, वीणा वादिनी, ज्ञान की ज्योति जगा दो,
मेरे शब्दों में सत्य और प्रेम का मधुर स्वर सजा दो।
अंधेरों से घिरा है मन का कोना, भटक रहा हूँ राहों में,
मिटा के अज्ञान का ये कुहासा, सुगम रास्ता दिखा दो।
जगत की चकाचौंध में न खो जाए कहीं सादगी मेरी,
मेरे अंतर्मन में तू अपनी भक्ति की मूरत बसा दो।
कोई राग ऐसा छेड़ो जो रूह को सुकून दे जाए माँ,
सुरों के संगम से आज मेरा वीरान गुलशन खिला दो।
नहीं मांगता मैं स्वर्ण-मुकुट या वैभव की ये दुनिया,
बस अपनी करुणा का एक कतरा मेरे दामन में गिरा दो।
कलम चले तो सिर्फ हक की बातें लिखे ज़माने के लिए,
मेरी स्याही में तुम अपनी पावनता का अमृत मिला दो।
भटक न जाए राह से कभी 'जी आर' इस स्वार्थ के जग में,
तू अपनी ममता की छाँव में उसे हरदम पनाह दे दो।
जी आर कवियुर
01 04 2026
(कनाडा, टोरंटो)
शिवाभूति
शिवाभूति
महादेव मनोहर,
महामाया के नाथ,
भक्तों के रखवाले,
मेरी प्रार्थना सुन लेना…
ॐ नम-श्शिवाय…
ॐ नम-श्शिवाय…
भव की रक्षा के लिए,
विष का पान किया तुमने,
नीलकंठ देव दयालु,
तेरे चरणों में शरण है…
ॐ नम-श्शिवाय…
ॐ नम-श्शिवाय…
गंगाधर शंकर,
चंद्रशेखर शूलपाणि,
भवभय हरण महेश्वर,
अपनी कृपा बरसा देना…
ॐ नम-श्शिवाय…
ॐ नम-श्शिवाय…
पाशुपते परमेश्वर,
अनंत करुणा सागर,
अनाथों के रखवाले,
मुझे अभय दे देना…
जी आर कवियुर
01 04 2026
(कनाडा, टोरंटो)
इन पत्थरों की जुबां से ( ग़ज़ल)
इन पत्थरों की जुबां से
( ग़ज़ल)
पत्थरों के पास भी कहने को बातें हैं,
मौन में छुपी अनगिनत यादें हैं।
समय के कदमों ने छुआ जिन राहों को,
उनमें बसतीं गवाही की छायें हैं।
बारिश ने छूकर यादें जगाईं,
धूप ने कठोर लम्हे बनाए हैं।
बिना शब्दों के सच कह जाते,
मौन में अपनी भाषा सुनाते हैं।
रास्तों के किनारे पड़े ये रूप,
यात्राओं के राज़ संभाले हुए हैं।
अनदेखी आँखें भी समझ जाएं,
ये जीवन को चुपचाप लिखे हुए हैं।
हर पल ये पत्थर अपनी कहानी कहते हैं,
हर छायां में जीवन के राज़ पलते हैं।
ये दिल की बातें मैं जी आर कह देता हूँ,
इन पत्थरों की जुबां में मेरी परछाइयाँ साफ़ दिखाई देती हैं।
जी आर कवियुर
30 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)
“यादों की दुनिया” ( ग़ज़ल )
“यादों की दुनिया” ( ग़ज़ल )
तेरी यादों में ही मेरी दुनिया बसती है,
तेरी यादों में ही मेरी हर खुशी पलती है।
तेरे बिना ये जिंदगी अधूरी है,
तेरे बिना हर ख्वाब मेरी आँखों में भारी है।
हर पल तेरी यादों में दिल मेरा खोता है,
हर लम्हा तेरे ख्यालों में आत्मा मेरा रोता है।
तेरी हँसी की चमक से घर मेरा रोशन है,
तेरी मुस्कान के बिना हर सपना सुना सा है।
तेरी बातें जो दिल से दिल तक जाती है,
तेरी यादों की खुशबू हर राह में आती है।
हर शाम तेरी यादें मन को भिगोती है,
हर सुबह तेरी बातें मुझे जीना सिखाती है।
तेरे बिना ये मौसम भी बेरंग सा है,
तेरे बिना ये दुनिया कुछ अधूरी सी है।
तेरी यादों के साए में मैं खुद को पाता है,
तेरे ख्यालों के संग हर दर्द भूल जाता है।
ये दिल की बातें मैं जी आर कह देता हूँ,
तेरी यादों में ही मैंने अपनी जिंदगी बहा दी है।
जी आर कवियुर
30 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)
पत्थरों की भी कहानियाँ
पत्थरों की भी कहानियाँ
पत्थरों के पास भी कहने को बातें हैं,
मौन में छुपी अनगिनत यादें हैं।
समय के कदमों ने छुआ जिन राहों को,
उनमें बसतीं गवाही की छायें हैं।
बारिश ने छूकर यादें जगाईं,
धूप ने कठोर लम्हे बनाए।
बिना शब्दों के सच कह जाते,
मौन में अपनी भाषा सुनाते।
रास्तों के किनारे पड़े ये रूप,
यात्राओं के राज़ संभाले हुए।
अनदेखी आँखें भी समझ जाएं,
ये जीवन को चुपचाप लिखे हुए।
जी आर कवियुर
30 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)
दिव्य प्राण-वायु (शून्य सी बाँसुरी)
दिव्य प्राण-वायु (शून्य सी बाँसुरी)
इस शून्य सी बाँसुरी में - अपनी
प्राण-वायु भर दो तुम...
इससे बहती हर रागिनी में - मेरा
आत्म-भाव भर दो तुम...
जब 'मैं' का भाव मिट जाता है
तब तेरा नाद जाग उठता है...
उंगलियों से रचे इस विस्मय में - तेरा
विश्व सारा समा जाता है...
अनजान राहों में सहारा बनके
ज्ञान बनकर मुझमें उतरना तुम...
बिना रुके गाऊँ इन गीतों में - सदा
ईश्वरीय चैतन्य जगाना तुम...
इस शून्य सी बाँसुरी में - अपनी
प्राण-वायु भर दो तुम...
इससे बहती हर रागिनी में - मेरा
आत्म-भाव भर दो तुम...
जी आर कवियूर
29-03-2026
(कनाडा, टोरंटो)
नैना (ग़ज़ल)
नैना (ग़ज़ल)
नैना जो देखें बाहर, वो माया का जाल है,
नैना जो देखें अंदर, वो सच का कमाल है।
दो जहान समाये हैं इन छोटी सी आँखों में,
इक ख़्वाब की दुनिया है, इक हक़ीक़त का साल है।
बरसात बनके बहते हैं ये अश्क पलकों से,
हिज्र की रातों का ये नम और गंभीर हाल है।
रौनक दुनिया की बस इक धोखा है सुब्हो-शाम,
अपने ही दिल में छुपा वो नूरानी जमाल है।
खामोश है ज़ुबान मगर नैना बोलते हैं सब,
इन इशारों में छुपा मोहब्बत का इलाल है।
अंधेरी राहों में बन जाते हैं ये खुद दिया,
भटके हुए कदमों को दिखाते ये मिसाल है।
सागर की गहराई हो या आसमां की वुसत,
नैना करें तलाश जो वो अनूठा सवाल है।
सब सच नहीं होता जो देखती हैं ये आँखें,
अनदेखा जो देख ले वो यथार्थ ख्याल है।
शेर की डाल पे 'जी आर' बुनता है जो ग़ज़ल,
अश्क और मुस्कान का वो अजीब इत्तिफ़ाक़ है।
जी आर कवियूर
28 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)
फूलों की कोमल खुशबू
फूलों की कोमल खुशबू
कोमल कुसुम प्रेम से खिलते हैं,
हल्की सुगंध हवा में बिखरती है।
जीवन के चक्र में बहते हुए,
प्रकृति अपनी निश्चब्द संगीत गाती है।
मधुमक्खियाँ इकट्ठा होती हैं, चुम्बन लाती हैं,
इसे नई सृष्टि की लहरों में बदल देती हैं।
एक दिन के लिए वे फूल के रूप में खिलते हैं,
फिर भगवान के चरणों पर गिर जाते हैं।
मिट्टी में गिरकर वे विश्राम करती हैं और मिल जाती हैं,
पुनः सृष्टि रचने के लिए पृथ्वी के साथ जुड़ जाती हैं।
प्रकृति चुपचाप अपने नियम का पालन करती है,
प्रकृति और प्रेम मिलकर सृष्टि के उल्लास को आगे बढ़ाते हैं।
जी आर कवियुर
02 02 2026
( कनाडा, टोरंटो)
क़ुदरत से इबारतें ( ग़ज़ल )
क़ुदरत से इबारतें ( ग़ज़ल )
सुबह की धूप ने ओस से की बातें
पेड़ों ने हवा से दी नई सौग़ातें
नदी ख़ामोश चली आई आईने की तरह
चाँद ने रात से की मुलाक़ातें
बारिशों ने भीगकर मिट्टी से सीखा सब्र
ख़ुशबुओं ने धरा से की मुलाक़ातें
पत्तियों ने हवा में लिखा इश्क़ का ख़त
डालियों ने वातावरण से की इबारतें
धूप-छाँव ने सिखाया हमें जीने का हुनर
वक़्त ने मौसमों से सीखी रिवायतें
जी आर पूछे अगर रब कहाँ मिलता है
क़ुदरत ने कहा — दिल से की इबादतें
जी आर कवियुर
03 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)
दिल की महफिल में (ग़ज़ल)
दिल की महफिल में (ग़ज़ल)
जी आर अब समझा कि दुनिया बड़ी है,
मेरे ही अंदर मगर एक दुनिया खड़ी है।
खामोश लम्हों में कुछ राज़ मिलते,
भीड़ के अंदर भी तन्हाई पड़ी है।
मैं ढूंढता रहा खुद को हर इक चेहरे में,
आईना बोला कि सच्चाई यहीं है।
आदमी हूँ मगर अदमी हूँ, यह मैं नहीं जानता,
आदत मेरी बुरी है, इंसान बनने को नहीं चाहता है।
वो जो मिले थे बड़े नाम लेकर,
उनसे भी गहरी मेरी ये कमी है।
सफ़र में सीखा न ऊँचा हूँ न नीचा,
बस सोच की अपनी ही एक सीढ़ी है।
हर शख्स अपने ही किस्सों में खोया,
दुनिया से ज्यादा ये अंदर की गली है।
ख्वाबों में भी कुछ सीखते रहे हम,
सफर में मिली हर सुबह की झड़ी है।
जी आर अब समझा कि दुनिया बड़ी है,
उसकी ही आवाज़ सबसे शांत है।
जी आर कवियुर
27 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)
करार है (ग़ज़ल)
करार है (ग़ज़ल)
दिल को भी ज़ुबाँ मिली — बीती यादों का करार है,
लम्हों में सदियों का सफ़र, आज भी करार है।
तेरी ख़ामोश नज़र में छुपा कैसा इकरार है,
बिन कहे जो दिल समझे, वही सच्चा करार है।
रात भर जागती आँखों को तेरा इंतज़ार है,
चाँदनी भी थम गई — जैसे उसको करार है।
तेरी बातों में अजीब सा कोई ऐतबार है,
झूठ भी सच लगे दिल को — ये कैसा करार है।
तेरी यादों का नशा दिल पे ऐसा ख़ुमार है,
होश में रह के भी जैसे कोई बेकरार है।
ज़िंदगी के हर मोड़ पे तेरा ही शिकार है,
दिल ये मासूम सा फिर भी उसी पे करार है।
दर्द को मुस्कुरा के हमने यूँ ही गुज़ार है,
हर खुशी के पीछे जैसे छुपा सा करार है।
'जी आर' हमने दर्द को लफ़्ज़ों में ढाल कर कह दिया,
जो भी सुन ले एक दफ़ा — उम्र भर करार है।
जी आर कवियुर
26 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)
दो देशों का संगम
दो देशों का संगम
कनाडा की बर्फ और मेपल की लाली,
सीएन टावर की वो ऊँचाई निराली।
पिज़्ज़ा का स्वाद और झील का किनारा,
यादों में बस गया है ये शहर हमारा।
नारियल के पेड़ और बहती नदियाँ,
डोसा-सांभर की महकती गलियाँ।
केरल की हरियाली में अब हम आए,
दोनों पोतों को गले से लगाए।
दो देशों का मेल, एक प्यारा संगम,
खुशियों की गूँज और दूर हुए गम।
प्यार का धागा सबको जोड़ता है,
नया कल मुस्कुराहटें बटोरता है।
जी आर कवियुर
26 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)
जीवन की यात्रा
जीवन की यात्रा
इस धरती के सपने सुंदर निराले,
हर पल कीमती, खुशियों वाले।
आसमान सा फैला यह जीवन हमारा,
पंख फैलाकर भरते ऊँची उड़ान।
बदलता संसार एक माया का खेल,
सामने दिखते केवल परछाईयों के मेल।
अनजानी राहों पर बढ़ते ही जाना,
हवा संग बहते बादलों का ठिकाना।
अंत में आती वो शांत सच्चाई,
मृत्यु ने सबकी इच्छाएं भुलाई।
सुनहरी रोशनी में विलीन होती रूह,
छोड़ जाती यहाँ यादों की खुशबू।
जी आर कवियुर
26 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)
बुझ जाएं। (ग़ज़ल)
बुझ जाएं। (ग़ज़ल)
समा और क्षमा भी बुझ जाएं,
रोशनी के रंगत में अंधकार बुझ जाएं।
सन्नाटा भी गूँज उठे,
चाँदनी में सब यादें बुझ जाएं।
दिल की राहों में चुप्प रहे,
अहसासों की हर कदर बुझ जाएं।
ख्वाबों के पंख भी टूट जाएं,
हसरतों की गलियों में सब बुझ जाएं।
ग़म की बारिश थम जाए,
आँसुओं की नदियाँ भी बुझ जाएं।
मौन की किताबें खुल जाएं,
क़िस्सों की हर पंक्ति बुझ जाएं।
राह-ए-मोहब्बत में छाँव ढल जाए,
सच्चाई की छवि में भ्रम बुझ जाए।
रात की चादर जब ढक जाए,
सपनों की दुनिया में भी सब बुझ जाएं।
जी आर की कलम से ये अल्फ़ाज़ बुझ जाएं,
हर दिल की गूँज में सिर्फ प्यार बुझ जाएं।
जी आर कवियूर
25-03-2026
(कनाडा, टोरंटो)
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