॥ माँ गंगा के चरणों में ॥
शिव की जटा से निकली धारा, पावन रूप तुम्हारा है,
पतित-पावनी हे माँ गंगे, तू ही जग का सहारा है।
वैशाख शुक्ल की सप्तमी को, धरा पर जो तुम आई हो,
अमृतमयी शीतल जल से, खुशियाँ साथ तुम लाई हो।
जह्नु ऋषि की तुम पुत्री हो, 'जाह्नवी' नाम तुम्हारा है,
पाप मिटाती हर प्राणी का, निर्मल प्रवाह तुम्हारा है।
पुण्य उदय होते हैं माँ, तेरे पावन एक दर्शन से,
जीवन सफल हो जाता है, श्रद्धापूर्ण आचमन से।
दीप दान की अनुपम शोभा, तट पर छटा निराली है,
आरती की पावन ध्वनि से, मन में छाई लाली है।
जन-जन की तुम तारिणी माता, नमन तुम्हें शत-बार करें,
भक्ति तुम्हारी हृदय में भरके, हम भवसागर पार करें।
जी आर कवियुर
22 04 2026
तिरुवल्ला कवियुर
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