नैना (ग़ज़ल)
नैना जो देखें बाहर, वो माया का जाल है,
नैना जो देखें अंदर, वो सच का कमाल है।
दो जहान समाये हैं इन छोटी सी आँखों में,
इक ख़्वाब की दुनिया है, इक हक़ीक़त का साल है।
बरसात बनके बहते हैं ये अश्क पलकों से,
हिज्र की रातों का ये नम और गंभीर हाल है।
रौनक दुनिया की बस इक धोखा है सुब्हो-शाम,
अपने ही दिल में छुपा वो नूरानी जमाल है।
खामोश है ज़ुबान मगर नैना बोलते हैं सब,
इन इशारों में छुपा मोहब्बत का इलाल है।
अंधेरी राहों में बन जाते हैं ये खुद दिया,
भटके हुए कदमों को दिखाते ये मिसाल है।
सागर की गहराई हो या आसमां की वुसत,
नैना करें तलाश जो वो अनूठा सवाल है।
सब सच नहीं होता जो देखती हैं ये आँखें,
अनदेखा जो देख ले वो यथार्थ ख्याल है।
शेर की डाल पे 'जी आर' बुनता है जो ग़ज़ल,
अश्क और मुस्कान का वो अजीब इत्तिफ़ाक़ है।
जी आर कवियूर
28 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)

No comments:
Post a Comment