पत्थरों के पास भी कहने को बातें हैं,
मौन में छुपी अनगिनत यादें हैं।
समय के कदमों ने छुआ जिन राहों को,
उनमें बसतीं गवाही की छायें हैं।
बारिश ने छूकर यादें जगाईं,
धूप ने कठोर लम्हे बनाए।
बिना शब्दों के सच कह जाते,
मौन में अपनी भाषा सुनाते।
रास्तों के किनारे पड़े ये रूप,
यात्राओं के राज़ संभाले हुए।
अनदेखी आँखें भी समझ जाएं,
ये जीवन को चुपचाप लिखे हुए।
जी आर कवियुर
30 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)
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