Tuesday, March 24, 2026

वि‍ज्ञान की रक्षक

 वि‍ज्ञान की रक्षक


गर्भ की धड़कन इसने सुनी,
जीवन की पहली सांस चुनी।
माँ के पास एक समझ बनी,
कल की नई एक राह बनी।

शिक्षा के हर पाठ में साथ,
मित्र बना थामे हर हाथ।
दफ्तर का हर बोझ हटाया,
बुद्धि का नया दीप जलाया।

सच्चे प्यार की डोर सजाई,
शादी की हर रस्म निभाई।
यादों को फिर अमर बनाया,
अंतिम पल में साथ निभाया।

 रोगों की हर जड़ पहचानी,
सेवा की है नई कहानी।
शांति का जग यह बनाएगा,
मानवता को यह बचाएगा।

धरती छोड़ सितारों में घर,
खत्म हुआ अब हर इक डर।
मशीन हमें राह दिखाएगी,
दुनिया नई यह बसाएगी।

जी आर कवियुर 
24 03 2026
(कनाडा , टोरंटो)

महकती है। (ग़ज़ल )

 महकती है। (ग़ज़ल )



गजरों में तेरी याद सदा महकती है,  
मेरी हर एक ग़ज़ल भी तुझसे महकती है।  

तेरे ख्यालों से दिल मेरा भर जाता है,  
तन्हाई की हर रात भी महकती है।  

तेरा नाम ही दिल में गूंजता रहता है,  
मेरे मन की हर बात यूँ महकती है।  

गुलशन में तेरे ही रंग नजर आते हैं,  
हर एक कली तेरे जैसी महकती है।  

मैं तो हूँ बस तेरे प्यार का दीवाना,  
तेरे दिल में मेरी चाहत महकती है।  

जब भी तू सामने आ जाता है मेरे,  
रूह की हर एक सांस भी महकती है।  

तेरे बिना ये दुनिया सूनी लगती है,  
तेरे होने से हर राह महकती है।  

'जीआर' की दुनिया में तेरी ही खुशबू है,  
मेरी हर एक धड़कन तुझसे महकती है।

जी आर कवियुर 
 24 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)

जल की सरगम”

 जल की सरगम”

बूँदें गिरें, फैलाए मृदु ध्वनि,
रेत पर लिखतीं कहानियाँ चुपचाप कहीं।
नरम बहाव में जन्में विचार नये,
स्थिरता में भी जीवन भरे साये।

आने वाली लहरें मन को ठंडक दें,
किनारे शांत स्वप्नों में रहें संजोए।
जब हवा धीरे बहती धारा को छूए,
लहरों में जागे मधुर संगीत झूले।

साया लंबा कंधों पर फैलता है,
क्या प्रकृति अपने रहस्य बताती है?
मौन धारा में छुपा एक स्वर,
हृदय तक पहुंचाए मार्ग नरम और दूर।

जी आर कवियुर 
23 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)

नई नज़र है

 यह किसी तरह का जिंदगी का सफर है. 
हर मोड़ पे एक नई नज़र है

चलना ही सीखा है हमने हमेशा,
रुकना तो बस मौत का ही डर है

मुश्किल राहों पे मुस्कुराना ही ,  
सबसे बड़ा इंसान का हुनर है

सफ़र है सफर है
सफ़र है सफर है

कहा जा रहे है किसे है यह मालूम
मंज़िल की किसे यह की पानी खबर है, 

तूफ़ान में भी जो न हारे हिम्मत, 
उसी के सिर पे जीत का सब्र है। 

दो पल की है ये दुनिया की रौनक, 
फिर वही तन्हाई का मकर है। 

नेकी की राहों पे चलते रहो तुम, 
नेक इनाम का सब को इंतज़ार है। 

धूप में जो दे साया हमेशा, 
मेरी माँ ही वो मोहब्बत का शजर है। 

लिखता है दिल से हर एक अल्फाज़, 
'G R' की ये शायरी बड़ी असर है।

निकला है (ग़ज़ल)

 निकला है (ग़ज़ल)




वफ़ा और बेफ़िक्री के दरमियाँ जो निकला है,  
नज़र बंद थी, ज़ुबाँ से ख़ामोशी ही निकला है।  

दिल के हर एक ज़ख्म से धुआँ सा निकला है,  
दर्द छुपाया था मगर हर लफ़्ज़ में निकला है।  

हम ने तो चाहा था सुकूँ इस भीड़ के दरमियाँ,  
हर शख़्स मगर अपने ही ख़्वाबों में निकला है।  

आईना जब भी देखा, अजनबी सा लगा मुझको,  
मेरा ही चेहरा मुझसे क्यों जुदा निकला है।  

रिश्तों की इस भीड़ में तन्हा ही रहा आखिर,  
हर हाथ मिलाने वाला फ़ासला निकला है।  

रातों की ख़ामोशी में जो राज़ छुपाए थे,  
हर एक सवेरा उनको बेपर्दा निकला है।  

किससे गिला करें हम इस दौर-ए-मोहब्बत में,  
हर दिल ही यहाँ थोड़ा सा टूटा निकला है।  

"जी आर" ने लिखी जब भी दिल की कहानी है,  
हर लफ़्ज़ उसी दर्द से भीगा सा निकला है।

जी आर कवियुर 
19 03 2026
(कनाडा , टोरंटो)

झील की संध्या

झील की संध्या 

पिछले पानी के किनारे संध्या डूब रही है,  
रोशनी धीरे-धीरे, जैसे हल्की बारिश, मंद पड़ रही है।  
ठंडी हवा और पत्तियों की लय,  
हृदय में प्रतिबिंबित होकर संगीत बन जाती है।  

पक्षी पेड़ों में शांत होकर बैठते हैं,  
पानी धीरे-धीरे किनारे से टकराकर मुस्कराता है।  
सुनहरी किरणें पानी की लहरों पर खेलती हैं,  
पत्थरों की मौनता छाया के बहाव की गवाह है।  

इस संध्या की सुंदरता में,  
समय यादों के साथ धीरे-धीरे बहता है।  
हृदय की लय झील के पानी के साथ जुड़ जाती है,  
जीवन की सुंदरता हर याद में भर जाती है।  

जी आर कवियूर
18 03 2026  
(कनाडा, टोरंटो)

Tuesday, March 17, 2026

പ്രവാസിയെന്ന കറവപ്പശു ( प्रवासी एक दूहती-गय(ग़ज़ल) जी आर कवियुर Fussion

പ്രവാസിയെന്ന കറവപ്പശു (ഗസൽ)
ജീ ആർ കവിയൂർ
 प्रवासी एक दूहती-गय(ग़ज़ल)
जी आर कवियुर 
Fussion 



[Intro: 30 Seconds of Melancholic Sarangi and Flute solo in Raag Shivranjini, deep atmospheric pads]

[Pallavi / Matla]
സംഘർഷമാർന്നൊരീ സാഹചര്യങ്ങളിൽ, നോവിൻ ഏകസ്വരം,
जुबानें अलग हैं मगर इस डर का है एक ही स्वर।
അടുക്കി വെച്ച കനവുകൾക്കും മിടിപ്പിനും ഏകസ്വരം,
बिखरे हुए ख्वाबों के मंजर का है एक ही स्वर।

[Instrumental Break: 10 Seconds of Haunting Bansuri Solo]

[Anupallavi / Sher 1]
ഒന്നിനു മുകളിൽ ഒന്നായ് അടുക്കിയ മരപ്പലകമേൽ,
ग़ैर-मुल्क की ठंडी सी चादर का है एक ही स्वर।
ഭാഷകൾ വേറെ, രാജ്യങ്ങൾ വേറെ എങ്കിലും—
ഭയത്തിന് പടരുന്ന കാറ്റിനും എന്നും ഏകസ്വരം।

[Instrumental Break: 10 Seconds of Crying Sarangi and Soft Tabla]

[Charanam / Sher 2]
ഇന്നലെ വരെ വിളികൾ വെറും ആവശ്യങ്ങൾക്കായിരുന്നു,
आज की खामोश उस सर-सर का है एक ही स्वर।
സ്നേഹം വഴിതെറ്റിയ നൂൽപാലം പോലെ—
ഇന്നീ മണിമുഴക്കങ്ങളിൽ കേൾപ്പൂ ഏകസ്വരം।

[Instrumental Break: 10 Seconds of Melancholic Violin and Pads]

[Signature / Maqta]
ജീ ആർ, ചിന്തിപ്പൂ ഇന്ന് കറവപ്പശുവാം ആ പ്രവാസിക്കായ്,
जी आर, आज सोचता है उस दूहती-गय' के लिए, 
गुर्बत में भी गूँजती खबर का है एक ही स्वर।
ദാരിദ്ര്യത്തിൻ നടുവിലും അവനെത്തീടുന്ന—
നൊമ്പരക്കടലിലെ തീരാത്തൊരാ ഏകസ്വരം।

[Outro: Fading sound of Flute with the whisper "Ek Hi Swar..." and a deep sigh]




प्रवासी का जीवन



प्रवासी का जीवन


संघर्षों से भरे हालात, ||

सूरज की किरणों में लहराता भय, ||

अपना देश और घर छोड़कर भटकता, ||

स्वतंत्रता के लिए कटती अनगिनत रातें... ||


नियोक्ताओं द्वारा दिए गए हॉलों में, ||

एक के ऊपर एक रखी बिस्तरों में, ||

मानवों ने अपने सपनों को बिछाया— ||

भाषाएँ अलग, देश अलग, ||

पर सपनों और भय की आवाज़ एक समान... ||


कल तक अपने रिश्तों की ||

बातों का उद्देश्य सिर्फ़ जरूरतें थीं, ||

“कल क्या चाहिए? आज क्या चाहिए?” इस तरह के सवालों में, ||

प्रेम कहीं खो सा गया था... ||


आज— ||

सिर्फ़ घंटियों की आवाज़ ही एक सांत्वना है, ||

“क्या तुम ठीक हो?” ऐसा एक शब्द ||

जिंदगी को थामे रखने वाली डोर की तरह— ||

फिर भी नहीं पूछा जाता... ||


आकाश में गूंजती ||

बारूद की गड़गड़ाहट, ||

पंछियों की नहीं अब ये आवाज़... ||

भय के लोहे के पंख, ||

निद्राहीन रातें... ||


प्रवासी हमेशा वही, ||

परिवार का वह भरोसेमंद, ||

आज अपनी ही जान का रखवाला, ||

कल क्या होगा यह नहीं जानता… ||


उसका हृदय— ||

दो हिस्सों में टूटा हुआ, ||

एक हिस्सा घर में, ||

दूसरा युद्ध की परछाइयों में... ||


अब भी प्रवासी गरीब जीवन में, ||

कपड़े के लिए भी कोई दूसरा नहीं, ||

वापस लौटने पर क्या होगा यह नहीं जानता, ||

उलझते हुए, पलटते हुए, ||

नींद खोई हुई बिस्तर पर लेटा है...


जी आर कवियुर 

17 03 2026

(कनाडा , टोरंटो)


उपहार भूल गए। ( ग़ज़ल )

उपहार भूल गए। ( ग़ज़ल )

ये पेड़-पौधे, ये नदियाँ, ये प्यार भूल गए
हम आदमी हैं मगर ऐतबार भूल गए।

सिर्फ़ धन की चमक ने है आँखों को घेरा
प्रकृति का पावन रूप और श्रृंगार भूल गए।

शहद समझ कर जिसे हम सब चाट रहे हैं
वो लोभ है, हम फूलों की बहार भूल गए।

मकान ईंटों के खड़े कर लिए हमने बड़े
मगर जो घर था धरा पर, वो संसार भूल गए।

परिंदों की चहक अब शोर लगती है हमें
हवाओं का धीमा सा वो दुलार भूल गए।

दौड़ में आगे निकलने की चाहत ऐसी हुई
सुकून मिलता था जहाँ, वो द्वार भूल गए।

समय रहते संभल जाऊँ अब मैं भी 'जी आर'
वरना कहेंगे लोग कि हम उपहार भूल गए।

जी आर कवियुर 
16 03 2026
(कनाडा , टोरंटो)

मौसमों का उपन्यास

मौसमों का उपन्यास

धरती के सीने पर कहानियाँ लिखकर,
वक्त बदलता है पन्ने हर रोज़ नए।
तपती धूप की जो लिखी थी पंक्तियाँ,
वसंत मिटा देता है उसे तितली बनके।

इंद्रधनुष से सजे वो रंगीन चित्र,
काले बादलों की लिखी वो कविताएँ।
कोहरे की चादर ओढ़े वो सर्दी का मौसम,
यादों से भर देता है मन की दिशाएँ।

ऋतुओं का यह सुंदर सा उपन्यास,
कुदरत की लिखावट में खिलता है।
धरती पर एक अटूट सफर की तरह,
हर दिन एक नई ताज़गी में मिलता है।


जी आर कवियुर 
16 03 2026
(कनाडा , टोरंटो)

आधी रात का गीत

आधी रात का गीत

निशब्द रात धरती को थामे खड़ी है,
आकाश में तारे चमकते हैं।
मंद समीर खिड़की को छू जाती है,
मौन का संगीत बिखेरती है।

दूर कहीं लहर सी सुनाई देती,
नदी की मधुर ध्वनि बहती है।
चाँदनी पथों पर बिखर जाती,
परछाइयाँ धीरे चलती हैं।

सपने मन में धीरे खिलते,
विचार शांति से बहते हैं।
नींद की छाया में सारा जग सोता,
आधी रात का गीत गूंजता है।

जी आर कवियुर 
16 03 2026
(कनाडा , टोरंटो)

वृक्ष प्रेम

वृक्ष प्रेम

धरती के माथे पर हरी छतरी ताने,
छाँव देता खड़ा है यह कल्पतरु।
जड़ें जब मिट्टी में गहरी समाती हैं,
बढ़ता है अंबर तक प्रेम अपार।

ऊँची डालियों पर पंछी गाते हैं,
हवा में लहराते पत्तों का संगीत।
फूल और फल दान में देकर,
सहनशीलता का सिखाते हैं ये गीत।

धूप और बारिश को खुद पर सहकर,
खड़ी है ये सखी हरी कांति लिए।
जीवन की साँस बनकर ये कुदरत,
धरती की बिखेरती है अनन्त प्रभा।


जी आर कवियुर 
16 03 2026
(कनाडा , टोरंटो)

झील की शाम

झील की शाम

सांझ की मद्धम रोशनी झील पर उतर आई है,
लहरों पर जैसे सुनहरी चमक सी छाई है।
नावें हौले से लहरों को सहलाती हुई,
खामोश सफर पर दूर कहीं जाती हुई।

नारियल की कतारें हवा में झूम रही हैं,
लहरें अंबर के रंगों को चूम रही हैं।
परिंदों की घर वापसी की गूंज सुनाई देती है,
ठहरी हुई तट रेखा बस राह देखती है।

ढलता सूरज सिंदूरी चित्र बना रहा है,
पानी की लकीरों पर कोई सपना बह रहा है।
मन के आंगन में बस शांति का बसेरा है,
झील की यह शाम, एक मीठी याद का घेरा है।

जी आर कवियुर 
16 03 2026
(कनाडा , टोरंटो)




बादलों के पार

बादलों के पार

चांदी जैसे बादलों में छुपा नीला गगन,
अनदेखी दुनिया का एक गहरा राज।
जब धुंध की बूंदें धीरे से छंटने लगीं,
आंखों के सामने जागी अंबर की चमक।

छिपे हुए सूरज का वह दिव्य तेज,
धरा पर आज बिखरे अनगिनत रंग।
अंधेरे की लहरें हटाकर खिली भोर,
नई उम्मीदें जगाती ये कोमल किरणें।

वो फासला जहाँ सपनों को पर लगें,
सीमाओं से परे एक अनंत डगर।
मन का सारा बोझ उतारने के लिए—
खिला है अब रौशनी का पावन तट।

जी आर कवियुर 
13 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)  

नीलम चट्टान की वेदी

नीलम चट्टान की वेदी

नभ को चूमता वह गहरा नीला पर्वत,
प्रकृति के सिंहासन सा खड़ा एक अजूबा।
कोहरे की चादर में लिपटी यह माटी,
आंखों को शीतलता देती अनमोल छवि।

गरजती हवाओं का वह धीमा शोर,
चट्टानों से टकराकर बिखरता संगीत।
सांझ का सूरज बिखेरे सुनहरा रंग,
खामोशी में घुलता हुआ शांत पल।

सदियों का गवाह बना यह पाषाण,
वीरता के प्रतीक सा धीरे से जागे।
वन की सुंदरता खिली है पास ही—
अनंत ब्रह्मांड का सत्य यहाँ चमकता है।

जी आर कवियुर 
13 03 2025
(कनाडा , टोरंटो)

तुलसी का फूल

तुलसी का फूल

भोर की हवा में धीरे लहराती,
तुलसी चौरे की हरित आभा।
दुल्हन सी खिलती छोटी कली,
मन में भर दे पावन सुगंध।

जब दीपक की ज्योति जलती है,
भक्ति का स्वर मंद उठता है।
हवा संग फैलती मधुर महक,
आत्मा को छूती दिव्य स्पर्श।

उस छोटे से फूल में छिपी है,
विश्वास की अमृत मधुरता।
घर-आँगन की धड़कन तुलसी,
जीवन पर बरसाए आशीष।

जी आर कवियुर 
13 03 2025
(कनाडा , टोरंटो)

सूरज का स्नेह

सूरज का स्नेह 

स्वर्ण किरणों से खिली भोर निराली,
धरा पर फैली महकती लाली।
ठंड की चादरें कोसों दूर हटीं,
भलाई की कलियां धूप में खिलीं।

धड़कती हवा जो छूकर गुजरी,
तन पर लगी मिठास भरी गर्मी।
पत्ते भी हंसे चमक ओढ़कर,
प्राणों में जगी रौशनी नई।

राहों से अब धुंध छंट गई,
जगत के दिल में ऊर्जा भर गई।
अंबर का यह सुनहरा रंग देखो,
जीवन देने को गले लगाता तुमको।

जी आर कवियुर 
13 03 2025
(कनाडा , टोरंटो)

उठती रही वो लहर। (ग़ज़ल)

उठती रही वो लहर। (ग़ज़ल)

तेरी यादों का सफ़र आँखों से गुज़री लहर,
मेरे दिल में आज तक उठती रही वो लहर।

रात की खामोशियों में याद तेरी आ गई,
मेरी आँखों में फिर से बन गई इक लहर।

चाँद भी चुपचाप सा बादल में छिपता ही रहा,
दिल के सागर में मगर उठती रही वो लहर।

तेरे कदमों की आहट दूर से जब सुनाई दी,
मेरी धड़कन में अचानक जाग उठी इक लहर।

साथ गुज़रे वो पल यादों में महकते ही रहे,
मन के सागर में हमेशा चलती रही वो लहर।

दूरियों ने भी हमें तुमसे जुदा कर ना सका,
मेरे अरमानों में अब भी है वही लहर।

जब भी तन्हाई में दिल तुमको पुकारे चुपके से,
मेरी सांसों में मचलती है कोई लहर।

जी आर दिल की कहानी यूँ ही कहता ही रहा,
तेरी यादों से उठी बन गई जीवन की लहर।


जी आर कवियुर 
12 03 2026
( कनाडा , टोरंटो)

ठंडी हवा में प्रेम


ठंडी हवा में प्रेम

ठंडी हवा में मैं तुम्हें खोजता हूँ,  
पत्तियों की सरसराहट में तुम्हारी आवाज़ सुनता हूँ।  
हृदय में प्यार बर्फ की तरह धीरे-धीरे बरसता है,  
अनकहे शब्दों में यह कसकर बंधा है।  

जब हवा हमारे हाथों से हल्की टकराती है,  
मैं सोचता हूँ, क्या दिल की लय साथ चलती है।  
क्षण की रोशनी में तुम्हारी आँखें देखकर,  
समय ठहर जाता है, हृदय गहराई में धड़कता है।  

स्नेह सितारों की तरह चमकता और छिपता है,  
हवा के हल्के स्पर्श से सपने जागते हैं।  
जब तुम और मैं एक साथ होते हैं,  
दुनिया मौन होकर इसका साक्षी बन जाती है।

जी आर कवियुर 
12 03 2026
( कनाडा , टोरंटो)

तुम्हारे लिए – ग़ज़ल

तुम्हारे लिए – ग़ज़ल

यादों में आज भी वो रातें जागती हैं तुम्हारे लिए
आँसू चुपचाप बहते रहे हर पल तुम्हारे लिए

भूल नहीं पाया वो मीठे दर्द दिल के भीतर
आज भी धड़कता है ये दिल बस तुम्हारे लिए

ख़्वाहिशों के रंग चुपके से बरसते रहे दिल में
कितने सपने सँजोकर रखा मैंने तुम्हारे लिए

एक नज़र की रोशनी पाने को भटकता रहा दिल
प्यासा सा ये मन तड़पता रहा तुम्हारे लिए

कितनी बार निगाहें आपस में टकराई चुपचाप
दिल का सच मगर छुपा रहा हमेशा तुम्हारे लिए

लोगों की नज़रों से बचकर चलता रहा वो रास्ता
यादों के पन्नों में सब कुछ रखा तुम्हारे लिए

जब भी तन्हा देखा तुम्हें कहना तो बहुत कुछ था
सादे से शब्द ढूँढता रहा मैं तुम्हारे लिए

इन राज़ों और ख़्वाहिशों का वो अजब सा रिश्ता
साँसों के आख़िरी सफ़र तक रहेगा तुम्हारे लिए

मोहब्बत के अक्षरों से ये दास्ताँ मिटेगी नहीं
दिल की किताब में लिखी है हमेशा तुम्हारे लिए

विरह की स्याही से शेर लिखता रहा मैं तुम्हारे लिए
“जी आर” आज भी यादों में जीता है तुम्हारे लिए

जी आर कवियुर 
12 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)

आत्मा की यात्रा (ग़ज़ल)

आत्मा की यात्रा (ग़ज़ल)

राहें लंबी थीं, पर बढ़ती रही आत्मा की यात्रा,
तन ठहर गया यहाँ, पर चलती रही आत्मा की यात्रा।

धूप और छाँव में सहती रही हर पीड़ा,
सबको सहते हुए बढ़ती रही आत्मा की यात्रा।

टूटे ख्वाबों में भी जलता रहा उम्मीद का दीप,
रात ढलती रही, चमकती रही आत्मा की यात्रा।

मंज़िलें दूर थीं, मगर हौसले न थमे,
समय के साथ सँवरती रही आत्मा की यात्रा।

दुनिया की भीड़ में तन्हा हर इंसान,
भीतर ही भीतर पलती रही आत्मा की यात्रा।

“जी आर” ये जिस्म मिट्टी में मिल जाएगा एक दिन,
पर वक्त से परे चलती रहेगी आत्मा की यात्रा।

जी आर कवियुर 
11 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)

अकेले विचार – 136

अकेले विचार – 136

मौन में भी दिल ने गीत गाया,
बरसात की बूँदों में उसने सफ़र पाया,
छोटे–छोटे स्थानों में महसूस किया हवा का खेल,
कष्टों से उभरी नई सच्चाई की रेख।

ठंडी रातों में आशा को थामे रखा,
छूटे हुए यादों में करुणा को देखा,
दुःख की यात्राओं में वीरता छुपकर खड़ी रही,
स्नेह और देखभाल को दिल ने नज़दीक से तौला।

अज्ञात राहों में विश्वास की चमक मिली,
अनजाने प्रवाह में सपनों को छुआ,
साहसिक यात्राओं में शांति का अमृत चखा,
जीवन की सुंदरता हर पल दिखाई दी।

जी आर कवियुर 
09 03 2026 
( कनाडा, टोरंटो)


रूठी रात, मुस्कुराती सुबह (ग़ज़ल)

रूठी रात, मुस्कुराती सुबह 
(ग़ज़ल)

रात रूठ कर सोई थी घर की रौशनी भी,
सुबह मुस्कुराकर फिर वही आँगन मिला।

खामोशी में बीती थी सारी रात जैसे,
पलकों पे मगर उम्मीद का दामन मिला।

कुछ लफ़्ज़ कड़वे थे, कुछ शिकवे अधूरे,
सुबह हुई तो दिल को नया सावन मिला।

ग़ुस्से की लहर थी, दिल थोड़ा उदास था,
तेरी हँसी में फिर वही अपनापन मिला।

छोटी-सी बातों में दूरी बढ़ गई थी,
एक प्यार भरी नज़र से ही जीवन मिला।

रात की तन्हाई में दिल बहुत भारी था,
जब प्यार से बोला तो दिल को करार मिला।

जी आर ने सीखा है रिश्तों का ये मतलब,
रूठे भी अगर लोग हों तो अपनापन मिला।

जी आर कवियुर 
09 03 2026
(कनाडा , टोरंटो)


फ़ायदा नहीं ( एक ग़ज़ल)

फ़ायदा नहीं ( एक ग़ज़ल)

तुम्हारी नियत इतनी बुरी तो नहीं,  
मगर अब तुम्हें याद करने का फ़ायदा नहीं।

जो बीत गया उसे फिर से जगाने का क्या,  
इन सूखे ज़ख्मों को कुरेदने का फ़ायदा नहीं।

दिल ने बहुत चाहा कि रिश्ता फिर सँवर जाए,  
मगर टूटे दिल को सँवारने का फ़ायदा नहीं।

वो लौट भी आए तो क्या बदलेगा अब यहाँ,  
पुरानी बातों को दोहराने का फ़ायदा नहीं।

अब ख़ामोशी ही बेहतर है इन रिश्तों की राह में,  
हर बात को लफ़्ज़ों में उतारने का फ़ायदा नहीं।

समझौते भी कर लिए, सब्र भी आज़मा लिया,  
अब दर्द को दिल में छुपाने का फ़ायदा नहीं।

जी आर अब छोड़ भी दे इन बीती हुई बातों को,  
इस बुझती आग को भड़काने का फ़ायदा नहीं।

जी आर कवियुर 
8.03. 2026
(कनाडा टोरंटो)

नारी की रोशनी(ग़ज़ल)

नारी की रोशनी
(ग़ज़ल)

माँ के आँचल में मोहब्बत की रोशनी देखी
बहन की बातों में करुणा की चाँदनी देखी

दर्द सीने में छुपाकर भी जो मुस्काती है
हमने उस चेहरे पे हिम्मत की रोशनी देखी

घर के आँगन में जो हर रोज़ दिया जलता है
उस दिए में भी किसी नारी की रोशनी देखी

राह मुश्किल हो तो भी साथ निभाती है जो
उसके कदमों में सदा सच्ची सादगी देखी

वक्त बदले तो भी जो राह दिखाती जाए
उसकी आँखों में नई सुबह की रोशनी देखी

आदि शक्ति की झलक हर रूप में मिलती है
"जी आर" ने जहाँ देखा, नारी की रोशनी देखी

जी आर कवियुर 
08 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)

अधूरी तमन्नाएँ (ग़ज़ल)

अधूरी तमन्नाएँ (ग़ज़ल)

चंद तारों को छूने की तमन्ना तो थी
मगर तेरे बिना ये पूरी कैसे होगी समझ न थी

तेरी आँखों में जो सपनों की चमक देखी थी
उस चमक के बिना दुनिया में कोई रोशनी न थी

दिल ने चाहा था तेरे साथ सफ़र उम्र भर का
राह में तेरे बिना कोई भी मंज़िल खुशी न थी

रात तन्हा थी मगर चाँद भी खामोश रहा
जैसे उसकी भी कहानी में कोई चाँदनी न थी

तेरी यादों का सहारा ही मिला जीने को
वरना इस दिल में धड़कने की भी कोई वजह न थी

ख़्वाब बिखरे तो पता चला मोहब्बत क्या है
वरना इस दिल को दर्द की कोई भी सज़ा न थी

अब ग़ज़ल बनके तेरी याद ही लब पर आई
जी आर की इस दिली दास्ताँ में तेरे सिवा कोई न थी

जी आर कवियुर 
06 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)


नादानी की रौशनी (ग़ज़ल)

नादानी की रौशनी (ग़ज़ल)

हाथ में जलता हुआ दीया था मगर खबर न थी
रौशनी साथ थी मेरे, फिर भी तलाश आग की थी

तू करीब ही रहा हर पल मेरे रास्तों में
मेरी नज़र ही भटकी थी, दिल को ये खबर न थी

तेरे दिल में ही बसा था मेरा छोटा सा जहाँ
मैं ही अंजान रहा, इतनी भी समझ न थी

तेरी खामोश निगाहों में कई राज़ थे
मैं ही नादान था, पढ़ने की मुझे फ़न न थी

साथ चलती रही तेरी प्रेम की छाया हर कदम
मैं ही अनजान रहा, दिल को यह पहचान न थी

जब जुदाई ने सिखाया तो समझ आया मुझे
पास रहकर भी कभी इतनी दूरी न थी

अब ग़ज़ल बनके ये अफ़साना लबों पर आया
जी आर की ज़िंदगी में ऐसी भी नादानी कम न थी

जी आर कवियुर 
06 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)



यह धरती सिर्फ़ तुम्हारी नहीं है

Verse 1]
अरे इंसान, समझो तुम  
यह धरती सिर्फ़ तुम्हारी नहीं है  
चुपचाप देखो उन मासूम जीवों को  
जो निस्वार्थ हैं, पवित्र और निर्दोष  

[Pallavi]
अरे इंसान, समझो तुम  
यह धरती सिर्फ़ तुम्हारी नहीं है  
ओ ओ ओ ओहो आ आह  
ओ ओ ओ ओहो आ आह  


[Verse 2]
जमीन और आसमान तुम्हारे हो सकते हैं  
पर इंसान ने क्रूरता फैलाई बहुत  
स्वार्थ और लड़ाई में चोट खाए ये जीव  
मौन सहते हैं, तुम बस देखो  
  

[Verse 3]
प्यार की बारिश हो, हर वन में गूंजे  
हिंसा से मुक्त एक दुनिया उगें  
हम सब मिलकर बचाएं ये माटी  
उठे शांति का नया गीत  

[Pallavi]

अरे इंसान, समझो तुम  
यह धरती सिर्फ़ तुम्हारी नहीं है  
ओ ओ ओ ओहो आ आह  
ओ ओ ओ ओहो आ आह  

Thursday, March 5, 2026

देखभाल के पदचिन्ह

 देखभाल के पदचिन्ह 

तुम छाया देने वाले वृक्ष की तरह खड़े हो,  
घुमावदार रास्तों में सहारा बनते हो।  
जब प्रेम का स्पर्श सांत्वना बनकर बरसता है,  
दिल के दर्द धीरे-धीरे मिट जाते हैं।  

तुम्हारे फैलाए हाथ साहस देते हैं,  
नए जीवन के लिए मार्ग उजागर करते हैं।  
आँखों में कोमलता के साथ, तुम अंधकार दूर करते हो,  
सत्य को सीधे रास्तों पर प्रदर्शित करते हो।  

अडिग सतर्कता तुम्हें शक्ति से भर देती है,  
समय इन मूल्यवान पलों को धन्य बनाता है।  
इस यात्रा में हम हमेशा साथ चलते हैं,  
देखभाल सोने के तारे की तरह चमकती है।

जी आर कवियुर 
03 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)

बिजली का दीपक

 बिजली का दीपक

अंधकार की चादर के नीचे आकाश प्रतीक्षा करता है,  
बादलों का हृदय भारी और पूर्ण है।  
अचानक एक बिजली रेखा खींचती है,  
मौन की छाती पर रोशनी पड़ती है।  

केवल एक क्षण के लिए चमक,  
फिर भी मन में अनंत रूप से बस जाती है।  
यह चमक भय की छायाओं को प्रश्न करती है,  
अंधकार को धीरे से पीछे धकेलती है।  

बिजली का दीपक अपनी चमक में अल्पकालिक है,  
फिर भी सच्चाई को स्पष्ट दिखाता है।  
अंधकार और प्रकाश की सीमा के बीच,  
जीवन अपनी राह स्वयं खोज लेता है।

जी आर कवियुर 
03 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)

संध्या तारे की मधुरता

 संध्या तारे की मधुरता

संध्या तारा आकाश में धीमे से चमकता है,  
दिन की हलचल धीरे-धीरे धुंधली हो जाती है।  
जब लालिमा भरी रोशनी हवा में घुलती है,  
मन स्थिरता का रंग स्वीकार करता है।  

गलियों की आवाज़ें मंद पड़ जाती हैं,  
घर लौटते पक्षी क्षण को भर देते हैं।  
संध्या तारे की कोमल मुस्कान  
अंतरात्मा में सुकून बिखेरती है।  

दूर कहीं एक दीप शांत जलता है,  
समय अपने कदम धीमे बढ़ाता है।  
संध्या तारे की मधुरता मन में भर जाती है,  
आने वाली रात में आशा धीरे से प्रवेश करती है।

जी आर कवियुर 
03 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)

होली को भूल गए क्या?© (ग़ज़ल)

 होली को भूल गए क्या?©
(ग़ज़ल)


शायद ऐ शायर तुम भी भूल चुके हो  
होली का रंगीन मौसम भूल चुके हो  

फूलों ने फिर रंग बिखेरे हैं चमन में  
तुम दिल के अपने उसूल भूल चुके हो  

पलकों पे ठहरी हुई यादों की धूल  
उस चाहत का हर इक शूल भूल चुके हो  

फागुन की हवाओं ने संदेश सुनाया  
तुम मिलन का सादा सा मूल भूल चुके हो  

रुत ने बदले हैं कितने रंग यहाँ पर  
तुम जीवन का मीठा सा फूल भूल चुके हो  

थोड़ा सा विरह भी है इन रंगों के अंदर  
तुम हँसने का भोला सा उसूल भूल चुके हो  

‘जी आर’ ये कहता है ग़ज़ल कैसे सुनाए  
जब लोग ही सुनने का रस भूल चुके हो

जी आर कवियुर 
02 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)

जाग जाओ दुनिया, उन कोपलों के लिए !

 जाग जाओ दुनिया, उन कोपलों के लिए !




ये युद्ध किसके लिए हैं?  
ईंधन रूपी उस धन के लिए?  
सीना जल रहा है इस वेदना से,  
और आँखें नम हुई जाती हैं।  

मैं हूँ? तुम हो? कौन है महान?  
रक्त-रंजित हवा में मौत की गूँज है।  
दबकर, कुचलकर जीवन चिल्ला रहा है,  
शाख से टूटकर गिर रही हैं कोमल पत्तियाँ।  

प्रकृति सब देख रही है,  
वह उत्तर देगी—कल देख लेना।  
पूरी धरती काँप रही है थर-थर,  
यह प्रतिशोध आख़िर किससे है?!  

अब बस करो यह खामोशी,  
भुला दो, क्षमा करो।  
मनन करो—इंसान बनो।  
बहुत मौतें हो चुकीं; अब जागो,  
उन मरते हुए मासूमों की आवाज़ बनो।  

आज ही रोक दो ये युद्ध,  
वरना कल इतिहास तुम पर सवाल उठाएगा।  
अब थम जाने दो इन शोरों को—  
यह दुनिया केवल दो पैरों वालों की नहीं।  

आँखें खोलो दुनिया!  
रोको इन युद्धों को, ऐ इंसान!  

जी आर कवियूर  
28-02-2026  
(टोरंटो, कनाडा)

फिर वही रात याद आई (ग़ज़ल)

 फिर वही रात याद आई (ग़ज़ल)

ठंडी हवाओं में तेरी बात याद आई,
चाँदनी छूते ही हर सौगात याद आई।

खामोशियों में भी थी तेरी ही रागिनी,
वीणा सी दिल में कोई बरसात याद आई।

सूनी सी राहों पे चलते रहे तन्हा,
पग-पग पे तेरी वो मुलाक़ात याद आई।

बीती हुई शामों की खुशबू महक उठी,
भीगी सी आँखों को हर रात याद आई।

सुनसान गली, चाँद धुँधला, धड़कन भारी,
उस पहली हँसी की करामात याद आई।

'जी आर' का दिल आज भी मानता ही नहीं,
साज़ों ने छेड़ा तो हर रात याद आई।

जी आर कवियुर 
26 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)

संभल कर बात कीजिए (ग़ज़ल)

 संभल कर बात कीजिए (ग़ज़ल)


मौसम यहाँ का सर्द है, ठहर कर बात कीजिए  
दिल भी बहुत नाज़ुक है, सोच कर बात कीजिए  

नज़रों में कुछ धुआँ सा है, देख कर बात कीजिए  
शायद कोई ख़्वाब टूटा हो, समझ कर बात कीजिए  

लफ़्ज़ों में आग भी छुपी है, परख कर बात कीजिए  
होठों की हल्की हँसी पर, ठहर कर बात कीजिए  

रिश्तों की डोर काँच सी है, पकड़ कर बात कीजिए  
टूटे तो फिर न जुड़ सकेगी, डर कर बात कीजिए  

माशूका तेरी याद भी है, गरम कर बात कीजिए  
मौसम की इस सर्दी में, सँवर कर बात कीजिए  

दुनिया बड़ी अजीब है ये, बदल कर बात कीजिए  
सच को ज़रा सा प्यार से, ढल कर बात कीजिए  

'जी आर' का दिल भी शीशा है, संभल कर बात कीजिए  
उसकी ख़ामोशी को पहले, समझ कर बात कीजिए

जी आर कवियुर 
26 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)

ढूँढता रहा” (ग़ज़ल)

 ढूँढता रहा” (ग़ज़ल)





ज़िंदगी की ग़ज़ल में मुखड़ा ढूँढता रहा,  
छंद और तुक के बीच अर्थ ढूँढता रहा।  

महफ़िलों की भीड़ में चेहरा बदलता रहा,  
मैं तेरी आँखों में दर्पण ढूँढता रहा।  

दीप की लौ रात भर धीरे-धीरे जलती रही,  
मैं उसी उजाले में पथ ढूँढता रहा।  

शब्द बनते-बिगड़ते रहे मन के आँगन में,  
हर अधूरे भाव में स्पंदन ढूँढता रहा।  

गीत समय की धूल में कहीं दबता ही रहा,  
मैं उसी धूल में अपना सावन ढूँढता रहा।  

"जी आर" अपने ही मन से प्रश्न करता रहा,  
हर पंक्ति में अपना जीवन ढूँढता रहा।

जी आर कवियुर 
25 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)

यादों की प्याली (ग़ज़ल).

 यादों की प्याली (ग़ज़ल).



खिड़की पे बैठा दुनिया को देखता हूँ मैं हौले,
यादों के पन्नों को एक-एक कर पलटता हूँ मैं हौले।

कलम के निशाँ ही बस साथ हैं इस घड़ी में,
दिल के समंदर में गम को सहता हूँ मैं हौले।

एक प्याली चाय में ही बसी है दुनिया मेरी,
किरणें ओस को जैसे चूमती हैं हौले।

वक़्त ठहरा है इस पल में ज़रा रुक कर,
खयालों में अपने ही मिलता हूँ मैं हौले।

मेहनत रंग लाएगी, वो सुबह ज़रूर आएगी,
सब्र रख 'जी आर', सपना खिलेगा हौले।

अपनी लकीरों में सोना भर रहा है जी आर,
ये ग़ज़ल महक कर दुनिया में फैलेगी हौले।

जी आर कवियुर 
24 02 2026
(कनाडा , टोरंटो)