Tuesday, March 24, 2026
विज्ञान की रक्षक
महकती है। (ग़ज़ल )
जल की सरगम”
नई नज़र है
निकला है (ग़ज़ल)
झील की संध्या
Tuesday, March 17, 2026
പ്രവാസിയെന്ന കറവപ്പശു ( प्रवासी एक दूहती-गय(ग़ज़ल) जी आर कवियुर Fussion
प्रवासी का जीवन
प्रवासी का जीवन
संघर्षों से भरे हालात, ||
सूरज की किरणों में लहराता भय, ||
अपना देश और घर छोड़कर भटकता, ||
स्वतंत्रता के लिए कटती अनगिनत रातें... ||
नियोक्ताओं द्वारा दिए गए हॉलों में, ||
एक के ऊपर एक रखी बिस्तरों में, ||
मानवों ने अपने सपनों को बिछाया— ||
भाषाएँ अलग, देश अलग, ||
पर सपनों और भय की आवाज़ एक समान... ||
कल तक अपने रिश्तों की ||
बातों का उद्देश्य सिर्फ़ जरूरतें थीं, ||
“कल क्या चाहिए? आज क्या चाहिए?” इस तरह के सवालों में, ||
प्रेम कहीं खो सा गया था... ||
आज— ||
सिर्फ़ घंटियों की आवाज़ ही एक सांत्वना है, ||
“क्या तुम ठीक हो?” ऐसा एक शब्द ||
जिंदगी को थामे रखने वाली डोर की तरह— ||
फिर भी नहीं पूछा जाता... ||
आकाश में गूंजती ||
बारूद की गड़गड़ाहट, ||
पंछियों की नहीं अब ये आवाज़... ||
भय के लोहे के पंख, ||
निद्राहीन रातें... ||
प्रवासी हमेशा वही, ||
परिवार का वह भरोसेमंद, ||
आज अपनी ही जान का रखवाला, ||
कल क्या होगा यह नहीं जानता… ||
उसका हृदय— ||
दो हिस्सों में टूटा हुआ, ||
एक हिस्सा घर में, ||
दूसरा युद्ध की परछाइयों में... ||
अब भी प्रवासी गरीब जीवन में, ||
कपड़े के लिए भी कोई दूसरा नहीं, ||
वापस लौटने पर क्या होगा यह नहीं जानता, ||
उलझते हुए, पलटते हुए, ||
नींद खोई हुई बिस्तर पर लेटा है...
जी आर कवियुर
17 03 2026
(कनाडा , टोरंटो)







