Tuesday, March 17, 2026

उपहार भूल गए। ( ग़ज़ल )

उपहार भूल गए। ( ग़ज़ल )

ये पेड़-पौधे, ये नदियाँ, ये प्यार भूल गए
हम आदमी हैं मगर ऐतबार भूल गए।

सिर्फ़ धन की चमक ने है आँखों को घेरा
प्रकृति का पावन रूप और श्रृंगार भूल गए।

शहद समझ कर जिसे हम सब चाट रहे हैं
वो लोभ है, हम फूलों की बहार भूल गए।

मकान ईंटों के खड़े कर लिए हमने बड़े
मगर जो घर था धरा पर, वो संसार भूल गए।

परिंदों की चहक अब शोर लगती है हमें
हवाओं का धीमा सा वो दुलार भूल गए।

दौड़ में आगे निकलने की चाहत ऐसी हुई
सुकून मिलता था जहाँ, वो द्वार भूल गए।

समय रहते संभल जाऊँ अब मैं भी 'जी आर'
वरना कहेंगे लोग कि हम उपहार भूल गए।

जी आर कवियुर 
16 03 2026
(कनाडा , टोरंटो)

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