सांझ की मद्धम रोशनी झील पर उतर आई है,
लहरों पर जैसे सुनहरी चमक सी छाई है।
नावें हौले से लहरों को सहलाती हुई,
खामोश सफर पर दूर कहीं जाती हुई।
नारियल की कतारें हवा में झूम रही हैं,
लहरें अंबर के रंगों को चूम रही हैं।
परिंदों की घर वापसी की गूंज सुनाई देती है,
ठहरी हुई तट रेखा बस राह देखती है।
ढलता सूरज सिंदूरी चित्र बना रहा है,
पानी की लकीरों पर कोई सपना बह रहा है।
मन के आंगन में बस शांति का बसेरा है,
झील की यह शाम, एक मीठी याद का घेरा है।
जी आर कवियुर
16 03 2026
(कनाडा , टोरंटो)
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