Tuesday, March 17, 2026

प्रवासी का जीवन



प्रवासी का जीवन


संघर्षों से भरे हालात, ||

सूरज की किरणों में लहराता भय, ||

अपना देश और घर छोड़कर भटकता, ||

स्वतंत्रता के लिए कटती अनगिनत रातें... ||


नियोक्ताओं द्वारा दिए गए हॉलों में, ||

एक के ऊपर एक रखी बिस्तरों में, ||

मानवों ने अपने सपनों को बिछाया— ||

भाषाएँ अलग, देश अलग, ||

पर सपनों और भय की आवाज़ एक समान... ||


कल तक अपने रिश्तों की ||

बातों का उद्देश्य सिर्फ़ जरूरतें थीं, ||

“कल क्या चाहिए? आज क्या चाहिए?” इस तरह के सवालों में, ||

प्रेम कहीं खो सा गया था... ||


आज— ||

सिर्फ़ घंटियों की आवाज़ ही एक सांत्वना है, ||

“क्या तुम ठीक हो?” ऐसा एक शब्द ||

जिंदगी को थामे रखने वाली डोर की तरह— ||

फिर भी नहीं पूछा जाता... ||


आकाश में गूंजती ||

बारूद की गड़गड़ाहट, ||

पंछियों की नहीं अब ये आवाज़... ||

भय के लोहे के पंख, ||

निद्राहीन रातें... ||


प्रवासी हमेशा वही, ||

परिवार का वह भरोसेमंद, ||

आज अपनी ही जान का रखवाला, ||

कल क्या होगा यह नहीं जानता… ||


उसका हृदय— ||

दो हिस्सों में टूटा हुआ, ||

एक हिस्सा घर में, ||

दूसरा युद्ध की परछाइयों में... ||


अब भी प्रवासी गरीब जीवन में, ||

कपड़े के लिए भी कोई दूसरा नहीं, ||

वापस लौटने पर क्या होगा यह नहीं जानता, ||

उलझते हुए, पलटते हुए, ||

नींद खोई हुई बिस्तर पर लेटा है...


जी आर कवियुर 

17 03 2026

(कनाडा , टोरंटो)


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