चांदी जैसे बादलों में छुपा नीला गगन,
अनदेखी दुनिया का एक गहरा राज।
जब धुंध की बूंदें धीरे से छंटने लगीं,
आंखों के सामने जागी अंबर की चमक।
छिपे हुए सूरज का वह दिव्य तेज,
धरा पर आज बिखरे अनगिनत रंग।
अंधेरे की लहरें हटाकर खिली भोर,
नई उम्मीदें जगाती ये कोमल किरणें।
वो फासला जहाँ सपनों को पर लगें,
सीमाओं से परे एक अनंत डगर।
मन का सारा बोझ उतारने के लिए—
खिला है अब रौशनी का पावन तट।
जी आर कवियुर
13 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)
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