Tuesday, March 17, 2026

नादानी की रौशनी (ग़ज़ल)

नादानी की रौशनी (ग़ज़ल)

हाथ में जलता हुआ दीया था मगर खबर न थी
रौशनी साथ थी मेरे, फिर भी तलाश आग की थी

तू करीब ही रहा हर पल मेरे रास्तों में
मेरी नज़र ही भटकी थी, दिल को ये खबर न थी

तेरे दिल में ही बसा था मेरा छोटा सा जहाँ
मैं ही अंजान रहा, इतनी भी समझ न थी

तेरी खामोश निगाहों में कई राज़ थे
मैं ही नादान था, पढ़ने की मुझे फ़न न थी

साथ चलती रही तेरी प्रेम की छाया हर कदम
मैं ही अनजान रहा, दिल को यह पहचान न थी

जब जुदाई ने सिखाया तो समझ आया मुझे
पास रहकर भी कभी इतनी दूरी न थी

अब ग़ज़ल बनके ये अफ़साना लबों पर आया
जी आर की ज़िंदगी में ऐसी भी नादानी कम न थी

जी आर कवियुर 
06 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)



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