हाथ में जलता हुआ दीया था मगर खबर न थी
रौशनी साथ थी मेरे, फिर भी तलाश आग की थी
तू करीब ही रहा हर पल मेरे रास्तों में
मेरी नज़र ही भटकी थी, दिल को ये खबर न थी
तेरे दिल में ही बसा था मेरा छोटा सा जहाँ
मैं ही अंजान रहा, इतनी भी समझ न थी
तेरी खामोश निगाहों में कई राज़ थे
मैं ही नादान था, पढ़ने की मुझे फ़न न थी
साथ चलती रही तेरी प्रेम की छाया हर कदम
मैं ही अनजान रहा, दिल को यह पहचान न थी
जब जुदाई ने सिखाया तो समझ आया मुझे
पास रहकर भी कभी इतनी दूरी न थी
अब ग़ज़ल बनके ये अफ़साना लबों पर आया
जी आर की ज़िंदगी में ऐसी भी नादानी कम न थी
जी आर कवियुर
06 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)
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