स्वर्ण किरणों से खिली भोर निराली,
धरा पर फैली महकती लाली।
ठंड की चादरें कोसों दूर हटीं,
भलाई की कलियां धूप में खिलीं।
धड़कती हवा जो छूकर गुजरी,
तन पर लगी मिठास भरी गर्मी।
पत्ते भी हंसे चमक ओढ़कर,
प्राणों में जगी रौशनी नई।
राहों से अब धुंध छंट गई,
जगत के दिल में ऊर्जा भर गई।
अंबर का यह सुनहरा रंग देखो,
जीवन देने को गले लगाता तुमको।
जी आर कवियुर
13 03 2025
(कनाडा , टोरंटो)
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