Tuesday, March 17, 2026

फ़ायदा नहीं ( एक ग़ज़ल)

फ़ायदा नहीं ( एक ग़ज़ल)

तुम्हारी नियत इतनी बुरी तो नहीं,  
मगर अब तुम्हें याद करने का फ़ायदा नहीं।

जो बीत गया उसे फिर से जगाने का क्या,  
इन सूखे ज़ख्मों को कुरेदने का फ़ायदा नहीं।

दिल ने बहुत चाहा कि रिश्ता फिर सँवर जाए,  
मगर टूटे दिल को सँवारने का फ़ायदा नहीं।

वो लौट भी आए तो क्या बदलेगा अब यहाँ,  
पुरानी बातों को दोहराने का फ़ायदा नहीं।

अब ख़ामोशी ही बेहतर है इन रिश्तों की राह में,  
हर बात को लफ़्ज़ों में उतारने का फ़ायदा नहीं।

समझौते भी कर लिए, सब्र भी आज़मा लिया,  
अब दर्द को दिल में छुपाने का फ़ायदा नहीं।

जी आर अब छोड़ भी दे इन बीती हुई बातों को,  
इस बुझती आग को भड़काने का फ़ायदा नहीं।

जी आर कवियुर 
8.03. 2026
(कनाडा टोरंटो)

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