Tuesday, March 24, 2026

निकला है (ग़ज़ल)

 निकला है (ग़ज़ल)




वफ़ा और बेफ़िक्री के दरमियाँ जो निकला है,  
नज़र बंद थी, ज़ुबाँ से ख़ामोशी ही निकला है।  

दिल के हर एक ज़ख्म से धुआँ सा निकला है,  
दर्द छुपाया था मगर हर लफ़्ज़ में निकला है।  

हम ने तो चाहा था सुकूँ इस भीड़ के दरमियाँ,  
हर शख़्स मगर अपने ही ख़्वाबों में निकला है।  

आईना जब भी देखा, अजनबी सा लगा मुझको,  
मेरा ही चेहरा मुझसे क्यों जुदा निकला है।  

रिश्तों की इस भीड़ में तन्हा ही रहा आखिर,  
हर हाथ मिलाने वाला फ़ासला निकला है।  

रातों की ख़ामोशी में जो राज़ छुपाए थे,  
हर एक सवेरा उनको बेपर्दा निकला है।  

किससे गिला करें हम इस दौर-ए-मोहब्बत में,  
हर दिल ही यहाँ थोड़ा सा टूटा निकला है।  

"जी आर" ने लिखी जब भी दिल की कहानी है,  
हर लफ़्ज़ उसी दर्द से भीगा सा निकला है।

जी आर कवियुर 
19 03 2026
(कनाडा , टोरंटो)

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