भोर की हवा में धीरे लहराती,
तुलसी चौरे की हरित आभा।
दुल्हन सी खिलती छोटी कली,
मन में भर दे पावन सुगंध।
जब दीपक की ज्योति जलती है,
भक्ति का स्वर मंद उठता है।
हवा संग फैलती मधुर महक,
आत्मा को छूती दिव्य स्पर्श।
उस छोटे से फूल में छिपी है,
विश्वास की अमृत मधुरता।
घर-आँगन की धड़कन तुलसी,
जीवन पर बरसाए आशीष।
जी आर कवियुर
13 03 2025
(कनाडा , टोरंटो)
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