Tuesday, March 17, 2026

रूठी रात, मुस्कुराती सुबह (ग़ज़ल)

रूठी रात, मुस्कुराती सुबह 
(ग़ज़ल)

रात रूठ कर सोई थी घर की रौशनी भी,
सुबह मुस्कुराकर फिर वही आँगन मिला।

खामोशी में बीती थी सारी रात जैसे,
पलकों पे मगर उम्मीद का दामन मिला।

कुछ लफ़्ज़ कड़वे थे, कुछ शिकवे अधूरे,
सुबह हुई तो दिल को नया सावन मिला।

ग़ुस्से की लहर थी, दिल थोड़ा उदास था,
तेरी हँसी में फिर वही अपनापन मिला।

छोटी-सी बातों में दूरी बढ़ गई थी,
एक प्यार भरी नज़र से ही जीवन मिला।

रात की तन्हाई में दिल बहुत भारी था,
जब प्यार से बोला तो दिल को करार मिला।

जी आर ने सीखा है रिश्तों का ये मतलब,
रूठे भी अगर लोग हों तो अपनापन मिला।

जी आर कवियुर 
09 03 2026
(कनाडा , टोरंटो)


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