नभ को चूमता वह गहरा नीला पर्वत,
प्रकृति के सिंहासन सा खड़ा एक अजूबा।
कोहरे की चादर में लिपटी यह माटी,
आंखों को शीतलता देती अनमोल छवि।
गरजती हवाओं का वह धीमा शोर,
चट्टानों से टकराकर बिखरता संगीत।
सांझ का सूरज बिखेरे सुनहरा रंग,
खामोशी में घुलता हुआ शांत पल।
सदियों का गवाह बना यह पाषाण,
वीरता के प्रतीक सा धीरे से जागे।
वन की सुंदरता खिली है पास ही—
अनंत ब्रह्मांड का सत्य यहाँ चमकता है।
जी आर कवियुर
13 03 2025
(कनाडा , टोरंटो)
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