यादों की प्याली (ग़ज़ल).
खिड़की पे बैठा दुनिया को देखता हूँ मैं हौले,
यादों के पन्नों को एक-एक कर पलटता हूँ मैं हौले।
कलम के निशाँ ही बस साथ हैं इस घड़ी में,
दिल के समंदर में गम को सहता हूँ मैं हौले।
एक प्याली चाय में ही बसी है दुनिया मेरी,
किरणें ओस को जैसे चूमती हैं हौले।
वक़्त ठहरा है इस पल में ज़रा रुक कर,
खयालों में अपने ही मिलता हूँ मैं हौले।
मेहनत रंग लाएगी, वो सुबह ज़रूर आएगी,
सब्र रख 'जी आर', सपना खिलेगा हौले।
अपनी लकीरों में सोना भर रहा है जी आर,
ये ग़ज़ल महक कर दुनिया में फैलेगी हौले।
जी आर कवियुर
24 02 2026
(कनाडा , टोरंटो)

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