ढूँढता रहा” (ग़ज़ल)
ज़िंदगी की ग़ज़ल में मुखड़ा ढूँढता रहा,
छंद और तुक के बीच अर्थ ढूँढता रहा।
महफ़िलों की भीड़ में चेहरा बदलता रहा,
मैं तेरी आँखों में दर्पण ढूँढता रहा।
दीप की लौ रात भर धीरे-धीरे जलती रही,
मैं उसी उजाले में पथ ढूँढता रहा।
शब्द बनते-बिगड़ते रहे मन के आँगन में,
हर अधूरे भाव में स्पंदन ढूँढता रहा।
गीत समय की धूल में कहीं दबता ही रहा,
मैं उसी धूल में अपना सावन ढूँढता रहा।
"जी आर" अपने ही मन से प्रश्न करता रहा,
हर पंक्ति में अपना जीवन ढूँढता रहा।
जी आर कवियुर
25 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)

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