जाग जाओ दुनिया, उन कोपलों के लिए !
ये युद्ध किसके लिए हैं?
ईंधन रूपी उस धन के लिए?
सीना जल रहा है इस वेदना से,
और आँखें नम हुई जाती हैं।
मैं हूँ? तुम हो? कौन है महान?
रक्त-रंजित हवा में मौत की गूँज है।
दबकर, कुचलकर जीवन चिल्ला रहा है,
शाख से टूटकर गिर रही हैं कोमल पत्तियाँ।
प्रकृति सब देख रही है,
वह उत्तर देगी—कल देख लेना।
पूरी धरती काँप रही है थर-थर,
यह प्रतिशोध आख़िर किससे है?!
अब बस करो यह खामोशी,
भुला दो, क्षमा करो।
मनन करो—इंसान बनो।
बहुत मौतें हो चुकीं; अब जागो,
उन मरते हुए मासूमों की आवाज़ बनो।
आज ही रोक दो ये युद्ध,
वरना कल इतिहास तुम पर सवाल उठाएगा।
अब थम जाने दो इन शोरों को—
यह दुनिया केवल दो पैरों वालों की नहीं।
आँखें खोलो दुनिया!
रोको इन युद्धों को, ऐ इंसान!
जी आर कवियूर
28-02-2026
(टोरंटो, कनाडा)

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