होली को भूल गए क्या?©
(ग़ज़ल)
शायद ऐ शायर तुम भी भूल चुके हो
होली का रंगीन मौसम भूल चुके हो
फूलों ने फिर रंग बिखेरे हैं चमन में
तुम दिल के अपने उसूल भूल चुके हो
पलकों पे ठहरी हुई यादों की धूल
उस चाहत का हर इक शूल भूल चुके हो
फागुन की हवाओं ने संदेश सुनाया
तुम मिलन का सादा सा मूल भूल चुके हो
रुत ने बदले हैं कितने रंग यहाँ पर
तुम जीवन का मीठा सा फूल भूल चुके हो
थोड़ा सा विरह भी है इन रंगों के अंदर
तुम हँसने का भोला सा उसूल भूल चुके हो
‘जी आर’ ये कहता है ग़ज़ल कैसे सुनाए
जब लोग ही सुनने का रस भूल चुके हो
जी आर कवियुर
02 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)

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