Thursday, March 5, 2026

फिर वही रात याद आई (ग़ज़ल)

 फिर वही रात याद आई (ग़ज़ल)

ठंडी हवाओं में तेरी बात याद आई,
चाँदनी छूते ही हर सौगात याद आई।

खामोशियों में भी थी तेरी ही रागिनी,
वीणा सी दिल में कोई बरसात याद आई।

सूनी सी राहों पे चलते रहे तन्हा,
पग-पग पे तेरी वो मुलाक़ात याद आई।

बीती हुई शामों की खुशबू महक उठी,
भीगी सी आँखों को हर रात याद आई।

सुनसान गली, चाँद धुँधला, धड़कन भारी,
उस पहली हँसी की करामात याद आई।

'जी आर' का दिल आज भी मानता ही नहीं,
साज़ों ने छेड़ा तो हर रात याद आई।

जी आर कवियुर 
26 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)

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