संध्या तारे की मधुरता
संध्या तारा आकाश में धीमे से चमकता है,
दिन की हलचल धीरे-धीरे धुंधली हो जाती है।
जब लालिमा भरी रोशनी हवा में घुलती है,
मन स्थिरता का रंग स्वीकार करता है।
गलियों की आवाज़ें मंद पड़ जाती हैं,
घर लौटते पक्षी क्षण को भर देते हैं।
संध्या तारे की कोमल मुस्कान
अंतरात्मा में सुकून बिखेरती है।
दूर कहीं एक दीप शांत जलता है,
समय अपने कदम धीमे बढ़ाता है।
संध्या तारे की मधुरता मन में भर जाती है,
आने वाली रात में आशा धीरे से प्रवेश करती है।
जी आर कवियुर
03 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)
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