Thursday, March 5, 2026

देखभाल के पदचिन्ह

 देखभाल के पदचिन्ह 

तुम छाया देने वाले वृक्ष की तरह खड़े हो,  
घुमावदार रास्तों में सहारा बनते हो।  
जब प्रेम का स्पर्श सांत्वना बनकर बरसता है,  
दिल के दर्द धीरे-धीरे मिट जाते हैं।  

तुम्हारे फैलाए हाथ साहस देते हैं,  
नए जीवन के लिए मार्ग उजागर करते हैं।  
आँखों में कोमलता के साथ, तुम अंधकार दूर करते हो,  
सत्य को सीधे रास्तों पर प्रदर्शित करते हो।  

अडिग सतर्कता तुम्हें शक्ति से भर देती है,  
समय इन मूल्यवान पलों को धन्य बनाता है।  
इस यात्रा में हम हमेशा साथ चलते हैं,  
देखभाल सोने के तारे की तरह चमकती है।

जी आर कवियुर 
03 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)

बिजली का दीपक

 बिजली का दीपक

अंधकार की चादर के नीचे आकाश प्रतीक्षा करता है,  
बादलों का हृदय भारी और पूर्ण है।  
अचानक एक बिजली रेखा खींचती है,  
मौन की छाती पर रोशनी पड़ती है।  

केवल एक क्षण के लिए चमक,  
फिर भी मन में अनंत रूप से बस जाती है।  
यह चमक भय की छायाओं को प्रश्न करती है,  
अंधकार को धीरे से पीछे धकेलती है।  

बिजली का दीपक अपनी चमक में अल्पकालिक है,  
फिर भी सच्चाई को स्पष्ट दिखाता है।  
अंधकार और प्रकाश की सीमा के बीच,  
जीवन अपनी राह स्वयं खोज लेता है।

जी आर कवियुर 
03 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)

संध्या तारे की मधुरता

 संध्या तारे की मधुरता

संध्या तारा आकाश में धीमे से चमकता है,  
दिन की हलचल धीरे-धीरे धुंधली हो जाती है।  
जब लालिमा भरी रोशनी हवा में घुलती है,  
मन स्थिरता का रंग स्वीकार करता है।  

गलियों की आवाज़ें मंद पड़ जाती हैं,  
घर लौटते पक्षी क्षण को भर देते हैं।  
संध्या तारे की कोमल मुस्कान  
अंतरात्मा में सुकून बिखेरती है।  

दूर कहीं एक दीप शांत जलता है,  
समय अपने कदम धीमे बढ़ाता है।  
संध्या तारे की मधुरता मन में भर जाती है,  
आने वाली रात में आशा धीरे से प्रवेश करती है।

जी आर कवियुर 
03 03 2026
(कनाडा, टोरंटो)

होली को भूल गए क्या?© (ग़ज़ल)

 होली को भूल गए क्या?©
(ग़ज़ल)


शायद ऐ शायर तुम भी भूल चुके हो  
होली का रंगीन मौसम भूल चुके हो  

फूलों ने फिर रंग बिखेरे हैं चमन में  
तुम दिल के अपने उसूल भूल चुके हो  

पलकों पे ठहरी हुई यादों की धूल  
उस चाहत का हर इक शूल भूल चुके हो  

फागुन की हवाओं ने संदेश सुनाया  
तुम मिलन का सादा सा मूल भूल चुके हो  

रुत ने बदले हैं कितने रंग यहाँ पर  
तुम जीवन का मीठा सा फूल भूल चुके हो  

थोड़ा सा विरह भी है इन रंगों के अंदर  
तुम हँसने का भोला सा उसूल भूल चुके हो  

‘जी आर’ ये कहता है ग़ज़ल कैसे सुनाए  
जब लोग ही सुनने का रस भूल चुके हो

जी आर कवियुर 
02 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)

जाग जाओ दुनिया, उन कोपलों के लिए !

 जाग जाओ दुनिया, उन कोपलों के लिए !




ये युद्ध किसके लिए हैं?  
ईंधन रूपी उस धन के लिए?  
सीना जल रहा है इस वेदना से,  
और आँखें नम हुई जाती हैं।  

मैं हूँ? तुम हो? कौन है महान?  
रक्त-रंजित हवा में मौत की गूँज है।  
दबकर, कुचलकर जीवन चिल्ला रहा है,  
शाख से टूटकर गिर रही हैं कोमल पत्तियाँ।  

प्रकृति सब देख रही है,  
वह उत्तर देगी—कल देख लेना।  
पूरी धरती काँप रही है थर-थर,  
यह प्रतिशोध आख़िर किससे है?!  

अब बस करो यह खामोशी,  
भुला दो, क्षमा करो।  
मनन करो—इंसान बनो।  
बहुत मौतें हो चुकीं; अब जागो,  
उन मरते हुए मासूमों की आवाज़ बनो।  

आज ही रोक दो ये युद्ध,  
वरना कल इतिहास तुम पर सवाल उठाएगा।  
अब थम जाने दो इन शोरों को—  
यह दुनिया केवल दो पैरों वालों की नहीं।  

आँखें खोलो दुनिया!  
रोको इन युद्धों को, ऐ इंसान!  

जी आर कवियूर  
28-02-2026  
(टोरंटो, कनाडा)

फिर वही रात याद आई (ग़ज़ल)

 फिर वही रात याद आई (ग़ज़ल)

ठंडी हवाओं में तेरी बात याद आई,
चाँदनी छूते ही हर सौगात याद आई।

खामोशियों में भी थी तेरी ही रागिनी,
वीणा सी दिल में कोई बरसात याद आई।

सूनी सी राहों पे चलते रहे तन्हा,
पग-पग पे तेरी वो मुलाक़ात याद आई।

बीती हुई शामों की खुशबू महक उठी,
भीगी सी आँखों को हर रात याद आई।

सुनसान गली, चाँद धुँधला, धड़कन भारी,
उस पहली हँसी की करामात याद आई।

'जी आर' का दिल आज भी मानता ही नहीं,
साज़ों ने छेड़ा तो हर रात याद आई।

जी आर कवियुर 
26 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)

संभल कर बात कीजिए (ग़ज़ल)

 संभल कर बात कीजिए (ग़ज़ल)


मौसम यहाँ का सर्द है, ठहर कर बात कीजिए  
दिल भी बहुत नाज़ुक है, सोच कर बात कीजिए  

नज़रों में कुछ धुआँ सा है, देख कर बात कीजिए  
शायद कोई ख़्वाब टूटा हो, समझ कर बात कीजिए  

लफ़्ज़ों में आग भी छुपी है, परख कर बात कीजिए  
होठों की हल्की हँसी पर, ठहर कर बात कीजिए  

रिश्तों की डोर काँच सी है, पकड़ कर बात कीजिए  
टूटे तो फिर न जुड़ सकेगी, डर कर बात कीजिए  

माशूका तेरी याद भी है, गरम कर बात कीजिए  
मौसम की इस सर्दी में, सँवर कर बात कीजिए  

दुनिया बड़ी अजीब है ये, बदल कर बात कीजिए  
सच को ज़रा सा प्यार से, ढल कर बात कीजिए  

'जी आर' का दिल भी शीशा है, संभल कर बात कीजिए  
उसकी ख़ामोशी को पहले, समझ कर बात कीजिए

जी आर कवियुर 
26 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)

ढूँढता रहा” (ग़ज़ल)

 ढूँढता रहा” (ग़ज़ल)





ज़िंदगी की ग़ज़ल में मुखड़ा ढूँढता रहा,  
छंद और तुक के बीच अर्थ ढूँढता रहा।  

महफ़िलों की भीड़ में चेहरा बदलता रहा,  
मैं तेरी आँखों में दर्पण ढूँढता रहा।  

दीप की लौ रात भर धीरे-धीरे जलती रही,  
मैं उसी उजाले में पथ ढूँढता रहा।  

शब्द बनते-बिगड़ते रहे मन के आँगन में,  
हर अधूरे भाव में स्पंदन ढूँढता रहा।  

गीत समय की धूल में कहीं दबता ही रहा,  
मैं उसी धूल में अपना सावन ढूँढता रहा।  

"जी आर" अपने ही मन से प्रश्न करता रहा,  
हर पंक्ति में अपना जीवन ढूँढता रहा।

जी आर कवियुर 
25 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)

यादों की प्याली (ग़ज़ल).

 यादों की प्याली (ग़ज़ल).



खिड़की पे बैठा दुनिया को देखता हूँ मैं हौले,
यादों के पन्नों को एक-एक कर पलटता हूँ मैं हौले।

कलम के निशाँ ही बस साथ हैं इस घड़ी में,
दिल के समंदर में गम को सहता हूँ मैं हौले।

एक प्याली चाय में ही बसी है दुनिया मेरी,
किरणें ओस को जैसे चूमती हैं हौले।

वक़्त ठहरा है इस पल में ज़रा रुक कर,
खयालों में अपने ही मिलता हूँ मैं हौले।

मेहनत रंग लाएगी, वो सुबह ज़रूर आएगी,
सब्र रख 'जी आर', सपना खिलेगा हौले।

अपनी लकीरों में सोना भर रहा है जी आर,
ये ग़ज़ल महक कर दुनिया में फैलेगी हौले।

जी आर कवियुर 
24 02 2026
(कनाडा , टोरंटो)